1857 से पहले ही रुहेलखंड में अंग्रेजों को चटा दी थी धूल
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1857 की क्रांति को देश की पहली संगठित बगावत माना जाता है, लेकिन उससे लगभग 60 साल पहले, उत्तर भारत के रुहेलखंड की ज़मीन पर अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी गई थी,और वो नाम थे नज्जू खां और बुलंद खां। बरेली के फतेहगंज पश्चिमी में लड़ी गई उस निर्णायक लड़ाई में रुहेला फौज ने अंग्रेजों को उनकी औकात दिखा दी थी। हजारों सैनिकों की मौत, अंग्रेज अफसरों की लाशें और भागती अंग्रेजी सेना… ये सब इतिहास के उन पन्नों में छुपा दिया गया, जिन्हें आज तक सही मायनों में पढ़ा ही नहीं गया।
तोप के सामने खड़े होने का मतलब था मौत…
लेकिन गुलामी से बड़ी मौत कोई नहीं होती, जब नज्जू खां और बुलंद खां को अंग्रेजों ने पकड़ कर उनके सामने दो रास्ते रखे, या तो अंग्रेजी हुकूमत को कुबूल करो…या तोप के सामने खड़े हो जाओ, तो उन्होंने बिना डरे दूसरा रास्ता चुना। तोप दागी गई… शरीर मिट गया… लेकिन इन्कलाब का बीज हमेशा के लिए इस मिट्टी में बो दिया गया।
क्रांति का पहला बिगुल रुहेलखंड से!
रामपुर स्टेट को बचाने के लिए जो जंग 1794 में छेड़ी गई थी, वो केवल एक सीमाई संघर्ष नहीं था, वो हिंदुस्तान की आज़ादी की पहली लड़ाई थी, जिसे अंग्रेज इतिहासकारों ने छुपा लिया। रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां, उनके सिपहसालार नज्जू खां और बुलंद खां, ये वो नाम हैं, जिनकी गूंज से बरेली, रामपुर, और पूरे अवध में आज़ादी की चिंगारी फैल चुकी थी। इस जीत के बाद जो जश्न मनाया गया, वो अंग्रेजों के लिए खौफ का पैगाम था, लेकिन अंग्रेजों ने धोखे से हमला कर जश्न मना रही फौज को खत्म कर डाला। हजारों सैनिक शहीद हुए, और नज्जू खां व बुलंद खां की तोप से शहादत ने क्रांति का रास्ता दिखाया।“वो सिर्फ जंग नहीं थी… वो एक इंकार था! एक नारा था, कि हम सर कटा सकते हैं, लेकिन अंग्रेजों की गुलामी मंजूर नहीं!”
फतेहगंज पश्चिमी में बारिश के बाद बहता है लाल पानी
उनकी कब्रें फतेहगंज पश्चिमी में आज भी मौजूद हैं। यहां हर बारिश के बाद मिट्टी से लाल पानी बहता है, मानो उनकी शहादत आज भी ज़िंदा है। सपा सरकार के दौरान, पूर्व मंत्री आजम खान ने इस स्थल का जीर्णोद्धार कराया, लेकिन वो इतिहास अब भी हमारे पाठ्यक्रमों और चर्चाओं से गायब है। यह सिर्फ बरेली की कहानी नहीं…ये उस जज़्बे की दास्तान है, जो किसी इतिहास की किताब में नहीं, ज़मीर की आवाज़ में ज़िंदा है।
