नई दिल्ली : देश की राजनीति में महिला आरक्षण कानून और परिसीमन को लेकर एक बार फिर माहौल गरमा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार इस मुद्दे को जल्दबाजी में आगे बढ़ा रही है, जिसके दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उनका मानना है कि इस तरह के संवेदनशील विषय पर बिना व्यापक चर्चा और सभी पक्षों की सहमति के कोई भी निर्णय लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
विशेष सत्र को लेकर उठे सवाल
खरगे ने बताया कि सरकार 16 से 18 अप्रैल तक संसद का विशेष सत्र बुलाने जा रही है। उनके अनुसार इस सत्र का मुख्य उद्देश्य महिला आरक्षण कानून से जुड़े संशोधन विधेयक को जल्द पास कराना है। उन्होंने इसे लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कदम आदर्श आचार संहिता की भावना के खिलाफ हो सकता है। उनका आरोप है कि सरकार बिना पर्याप्त विचार-विमर्श के इस विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकता है।
चुनावी लाभ का आरोप
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने यह भी आरोप लगाया कि महिला आरक्षण को लागू करने के पीछे सरकार की मंशा चुनावी लाभ उठाने की है। उनका कहना है कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि इसका राजनीतिक फायदा लिया जा सके। उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषय को राजनीति का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि इसे गंभीरता और ईमानदारी के साथ लागू किया जाना चाहिए।
परिसीमन और सीट बढ़ाने की योजना
खरगे ने परिसीमन को लेकर भी चिंता जताई है। उनके अनुसार सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने की योजना बना रही है। इसके साथ ही राज्यों की विधानसभा सीटों में भी बढ़ोतरी की बात सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो देश के चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं और इसका असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह के बड़े बदलावों को बिना व्यापक चर्चा के लागू करना सही नहीं होगा।
विपक्ष को भरोसे में न लेने का आरोप
कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों ने संसदीय कार्य मंत्री से अनुरोध किया था कि पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, ताकि सभी पक्ष मिलकर इस पर चर्चा कर सकें। लेकिन सरकार ने इस सुझाव को नजरअंदाज कर दिया और अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुटी रही। इससे साफ है कि सरकार संवाद के बजाय एकतरफा निर्णय लेने की दिशा में काम कर रही है।
लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर असर की आशंका
खरगे ने कहा कि इस तरह के फैसले लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसे इस तरह के मामलों में अधिक सक्रिय होना चाहिए। उनका मानना है कि यदि पारदर्शिता और निष्पक्षता को नजरअंदाज किया गया तो इससे जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
विपक्ष की संयुक्त रणनीति की तैयारी
इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अब एकजुट होने की तैयारी में हैं। मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि यह सिर्फ एक कानून का मामला नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे से जुड़ा बड़ा प्रश्न है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे को मजबूती से उठाएगा और सरकार से जवाब मांगेगा। आने वाले दिनों में इस विषय पर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन सकता है।
