कवि एवं पूर्व सांसद प्रो.उदय प्रताप सिंह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी श्रद्धांजलि
लखनऊ : हिंदी साहित्य और लखनऊ के सांस्कृतिक जीवन के लिए शुक्रवार (आज) एक गहरा आघात लगा है। प्रसिद्ध व्यंग्यकार और पूर्व रेलवे अधिकारी गोपाल चतुर्वेदी का प्रातः निधन हो गया। दुखद संयोग यह है कि उनकी पत्नी, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी निशा चतुर्वेदी, का निधन मात्र 8 दिन पहले (शुक्रवार) को ही हुआ था। इस गहरे व्यक्तिगत आघात से उबर नहीं पाने के कारण, गोपाल चतुर्वेदी की मानसिक और शारीरिक स्थिति बिगड़ती चली गई और आज उन्होंने भी इस संसार से विदा ले ली। उनके निधन की खबर से साहित्यकार, साहित्य प्रेमी और उनके चाहने वाले सदमें में हैं। तमाम लोग उनके घर श्रद्धांजलि देने पहुंचे। उनकी बेटी पत्रकार हैं। कवि एवं पूर्व सांसद प्रो.उदय प्रताप सिंह ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर श्रद्धांजलि दी है। यह सिर्फ दो व्यक्तियों का निधन नहीं, बल्कि एक युग का अवसान है।
एक साथ जीवन, एक साथ विदा
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https://youtu.be/SdTvVw0iw_8?si=I_NYKETTJGyz4pyG
जो लोग इस दंपती को करीब से जानते हैं, वे जानते हैं कि दोनों एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करते थे। जीवन भर प्रेम, सहयोग और सांस्कृतिक सक्रियता का प्रतीक रहे यह दंपती, अब एक साथ इतिहास का हिस्सा बन गए हैं। बताया जाता है कि लखनऊ के राणा प्रताप मार्ग स्थित उत्सव अपार्टमेंट में अंतिम सांस लेने वाले चतुर्वेदी दंपती, न सिर्फ साहित्य और प्रशासन में उच्च पदों पर रहे, बल्कि लखनऊ की तहज़ीब, शराफत और सद्भाव के जीवंत प्रतीक थे।
व्यंग्य को जिन्होंने गरिमा दी
15 अगस्त, 1942 को जन्मे गोपाल चतुर्वेदी हिंदी जगत के सम्मानित व्यंग्यकारों में गिने जाते थे। भारतीय रेल सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने पूर्णकालिक लेखन को अपनाया। उनकी रचनाएं ‘काकदृष्टि’, ‘हंस’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘पहल’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। उनकी लेखनी में हास्य की मार्मिकता और व्यंग्य की गहराई थी। जिसमें व्यवस्था पर तीखा प्रहार भी था और मानवीय करुणा भी।
प्रशासन में उत्कृष्टता और गरिमा का नाम थीं निशा चतुर्वेदी
81 वर्षीया निशा चतुर्वेदी का जन्म नैनीताल में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. किया और सिविल सेवा में चयनित हुईं। मुंबई में प्रशिक्षण के बाद उन्हें केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise) में असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में पहली नियुक्ति मिली। वे समाज सेवा, शिक्षा और साहित्यिक आयोजनों में भी सक्रिय रहीं। उनके निधन पर साहित्य, पत्रकारिता, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र की कई हस्तियां उनके आवास पर श्रद्धांजलि देने पहुंचीं थीं।
लखनऊ की आत्मा के पहरुए थे
गोपाल और निशा चतुर्वेदी लखनऊ के सामाजिक जीवन के ‘संरक्षक और संवाहक’ थे। साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर सांस्कृतिक संवाद तक उनकी उपस्थिति लखनऊ की तहज़ीब की पहचान बन चुकी थी। दोनों ने अपनी जीवन शैली, संवाद क्षमता और सौजन्यता से सैकड़ों युवाओं को प्रेरणा दी। गोपाल जी के चेहरे पर हमेशा एक आत्मीय मुस्कान रहती थी, जो किसी को भी सहज कर देती थी।
