लेखक
संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियन्स फेडरेशन
देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सार्वजनिक बैंक आज कर्मचारी संकट से जूझ रहे हैं। हाल ही में नेता विपक्ष द्वारा संसद में पूछे गए सवाल और सरकार द्वारा दिए गए उत्तर से साफ जाहिर होता है कि अधिकांश बैंकों में कर्मचारियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। सिर्फ 2025-26 में 48,578 नई नियुक्तियों की बात कही गई है। जिसमें चपरासी, लिपिक और अधिकारी स्तर के पद शामिल हैं, लेकिन सवाल उठता है। क्या यह संख्या पर्याप्त है?
बैंकों में भर्ती शून्य
हर साल हजारों की संख्या में रिटायरमेंट, प्रमोशन और आकस्मिकता होती है। मगर, इसके बावजूद निचले स्तर पर नई भर्तियां लगभग शून्य हैं। ग्रामीण और शहरी बैंक शाखाएं, दोनों में स्टाफ की भारी कमी हैं। इससे ग्राहकों को लाइन में लगकर घंटों इंतजार, ATM खराब, काउंटर बंद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
नए पद नहीं, सिर्फ मुनाफा!
सार्वजनिक बैंकों ने पिछले वर्षों में रिकॉर्ड लाभ कमाया है। इसके बावजूद सरकार ने 10 वर्षों में 12 लाख करोड़ रुपये का लोन बट्टे खाते में डाल दिया। यह रकम गरीबों की नहीं, बल्कि कॉरपोरेट डिफॉल्टर्स की थी।
रिज़र्व बैंक भी खामोश
हाल ही में RBI के डिप्टी गवर्नर ने ग्राहक सेवा सुधारने की बात तो कही, लेकिन स्टाफ की जरूरत पर मौन साध लिया। सिर्फ टॉप एक्जीक्यूटिव के पद बढ़ रहे हैं, जबकि क्लेरिकल व सपोर्ट स्टाफ, जो आम जनता से सीधा जुड़ाव रखते हैं, उन पर ध्यान नहीं है। 9 जुलाई की हड़ताल में भी नई भर्तियों को लेकर आवाज़ उठाई गई थी
