1947 में देश को आज़ादी तो मिल गई, लेकिन आज़ादी के साथ ही आई बँटवारे की आग, सीमाओं पर संकट, और सुरक्षा की भारी ज़िम्मेदारी। ऐसे कठिन समय में देश को ज़रूरत थी एक ऐसे नेता की, जो शब्दों से नहीं, कर्मों से राष्ट्र को दिशा दे। यह नेतृत्व मिला सरदार बलदेव सिंह के रूप में, जो भारत के पहले रक्षा मंत्री बने।
जमशेदपुर टाटा स्टील की छोड़ी नौकरी
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बलदेव सिंह का जन्म 11 जुलाई 1902 को धुम्मना गांव (रोपड़, पंजाब) में एक सिख परिवार में हुआ। उन्होंने अपनी शिक्षा अंबाला और खालसा कॉलेज, अमृतसर से प्राप्त की। इसके बाद वह जमशेदपुर गए। यहां उन्होंने अपने पिता की स्टील फैक्ट्री में कार्य कर प्रबंधन और औद्योगिक कार्यशैली सीखी। लेखक रंजीत सिंह की किताब *Sikh Achievers” के पेज 66 पर उनकी पढ़ाई,और देश के लिए नौकरी छोड़ने के बारे में बताया गया है।
ब्रिटिश हुकूमत में बने विधायक
लेखक गुरुपाल सिंह की किताब “Sikhs in Indian Politics” में उनकी सिख राजनीति में बुलंदी और प्रशासनिक अनुभव के बारे में बताया गया है। यहां लिखा है कि 1930 के दशक में बलदेव सिंह ने अकाली दल की सदस्यता ली और तारा सिंह के साथ सिख समुदाय के हितों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभाई। 1937 में उन्होंने अंबाला नॉर्थवेस्ट से विधानसभा चुनाव जीता और 1942 से 1946 तक पंजाब के विकास मंत्री रहे थे।
क्रिप्स और कैबिनेट मिशन में सिख प्रतिनिधि
बलदेव सिंह ने क्रिप्स मिशन (1942) और कैबिनेट मिशन (1946) में सिखों का प्रतिनिधित्व किया। यहां उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, संघीय ढांचे और विभाजन के विरोध की बात मजबूती से रखी। राइटर Granville Austin की किताब “The Indian Constitution Cornerstone of a Nation” में उनके अल्पसंख्यकों के हक के लिए किए गए संघर्षों के बारे में बताया गया है।
रक्षा मंत्री के रूप में निभाई ऐतिहासिक जिम्मेदारी
भारत के आज़ाद होते ही 15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू की अंतरिम सरकार में बलदेव सिंह को पहले रक्षा मंत्री का कार्यभार सौंपा गया। सरदार पटेल के साथ मिलकर उन्होंने देश की सुरक्षा, सैन्य ढांचे का पुनर्गठन, और दंगे-प्रभावित इलाकों में राहत सुनिश्चित की “Bipan Chandra et al., India Since Independence” किताब में आजादी के बाद सैन्य बल को मजबूत करने की कोशिशों के बारे में बताया गया है।
सेना निर्माण में निर्णायक दृष्टिकोण
बलदेव सिंह WWII के दौरान सेना में सिखों की भर्ती के पक्षधर थे। उनके अनुसार, “एक मज़बूत सेना ही देश की अस्मिता को सुरक्षित रख सकती है।”उन्होंने राजनीतिक विरोध के बावजूद इस पर जोर दिया। एक वास्तविक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण दिया। खुशबंत सिंह की किताब “A History of the Sikhs, Volume 2” में उनके सेना को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों की सराहना की गई है।
कांग्रेस में प्रवेश और अंतिम वर्ष
बलदेव सिंह के बारे में इतिहास ने अधिक नहीं लिखा है। मगर, उनके निर्णय, दृष्टिकोण और मौन सेवा ने भारत को एक सुरक्षित, संगठित और सशक्त राष्ट्र के रूप में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। आज जब हम “आजादी का अमृतकाल” मना रहे हैं, तो हमें चाहिए कि ऐसे गुमनाम राष्ट्रनिर्माताओं को याद करें, पढ़ें और सम्मान दें। 1952 में बलदेव सिंह अकाली दल से पहली लोकसभा में पहुँचे थे। 1957 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी जॉइन की और होशियारपुर से दोबारा सांसद बने। उनका निधन 29 जून 1961 को हुआ। उनकी समाधि दिल्ली के राजघाट परिसर के “किरणवन” में स्थित है।
