भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जहां हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने की भरपूर कोशिशें हुईं, तो वहीं कुछ ऐसे किरदार भी थे, जो ना सिर्फ भारत की आज़ादी के लिए लड़े, बल्कि देश के विभाजन के खिलाफ भी खुलकर खड़े हुए। डॉ. सैयद महमूद ऐसे ही नायकों में शामिल हैं। जिनकी कहानी इतिहास की मुख्यधारा में उतनी जगह नहीं पा सकी, जितनी वे हक़दार थे। यूपी के गाज़ीपुर जिले के सैयदपुर गाँव में 1889 में जन्म लेने वाले डॉ. सैयद महमूद ने MAO कॉलेज अलीगढ़,फिर लंदन और जर्मनी से डॉक्टरेट की डिग्री ली।
ब्रिटिश प्रिंसिपल के खिलाफ की बगावत
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डॉ. सैयद महमूद ने सबसे पहली क्रांति अलीगढ़ में ब्रिटिश प्रिंसिपल के खिलाफ की थी। उन्होंने हड़ताल की। जिसके चलते कॉलेज से निष्कासन किया गया। इसके बाक 1905 में बनारस कांग्रेस सत्र में भागीदारी की। 1919 में खिलाफ़त और असहयोग आंदोलन में भाग लिया। वह गांधी जी के निकटतम सहयोगियों में शुमार थे। 1923 में AICC के डिप्टी सेक्रेटरी, और नेहरू के साथ कांग्रेस संगठन में प्रमुख भूमिका। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन, मोतीलाल और नेहरू के साथ नैनी जेल में क़ैद रहे थे। 1937-1942 में बिहार सरकार में शिक्षा, उद्योग और बाढ़ नीति पर निर्णायक कार्य किया।
डॉ. सैयद महमूद ने मुस्लिम लीग का हमेशा किया विरोध
जब जिन्ना, और मुस्लिम लीग ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ को हवा दे रहे थे, तब डॉ. सैयद महमूद ने न सिर्फ उसका सिद्धांत का विरोध किया, बल्कि यह चेतावनी भी दी कि “इस रास्ते पर चलकर भारतीय मुसलमान खुद को अजनबी बना लेंगे।”उन्होंने कहा था कि “भारत में मुस्लिमों को पाकिस्तानी सरज़मीं का बेटा बताना, ना सिर्फ भारत के मुसलमानों के लिए खतरा है, बल्कि भारत की एकता के लिए भी विनाशकारी है।”
गांधी, नेहरू और मजहरुल हक के सहयोगी
डॉ. महमूद ने गांधी जी के साथ खिलाफत और असहयोग आंदोलन, नेहरू जी के साथ कांग्रेस संगठन और मौलाना मजहरुल हक के साथ कानूनी कार्य किए। उनकी शादी भी मौलाना हक़ की भतीजी से हुई थी। यह रिश्ता राजनीतिक और वैचारिक साझेदारी का प्रतीक बना। “The Khilafat and England” खिलाफ़त आंदोलन पर आधारित पुस्तक में उनके बारे में बताया गया है।
देश की पहली कैबिनेट में बने मंत्री
मुल्क की आजादी के बाद 1952 में पूर्वी चंपारण से लोकसभा सांसद चुने गए। इसके बाद कृषि, और उद्योग मंत्री का जिम्मा संभाला। उन्होंने पुनर्वास, और सांप्रदायिक सद्भाव पर कार्य किया। विभाजन के दंगों में पीड़ित हिंदू-मुसलमानों के पुनर्वास हेतु व्यक्तिगत रूप से काम किया। उनका निधन (इंतकाल 28 सितंबर 1971, दिल्ली में हुआ। डॉ. सैयद महमूद का जीवन भारत के धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और बहुलतावादी मूल्यों का प्रतीक है। उनका ऐतिहासिक योगदान आज के सांप्रदायिक विमर्श के धुंध में एक रौशनी की तरह चमकता है।
