बरेली : दरगाह आला हज़रत में उर्स-ए-हामिदी के दूसरे दिन हुज्जातुल इस्लाम मुफ्ती हामिद रज़ा खान साहब (हामिद मियां) के 85वें कुल शरीफ की रस्म देशभर से आए हजारों अकीदतमंदों की मौजूदगी में अदा की गई। इस मौके पर मदरसा मंज़र-ए-इस्लाम का 122वां दीक्षांत समारोह (दस्तारबंदी) भी आयोजित हुआ, जिसमें कुल 192 तलबा को दस्तार और डिग्रियां प्रदान की गईं।।दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रज़ा खान (सुब्हानी मियां), और सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रज़ा क़ादरी (अहसन मियां) मौजूद रहे। इस दौरान दीक्षांत प्राप्त 22 मुफ़्ती, 87 कारी, 03 हाफ़िज़, 80 आलिम को डिग्री दी गई। इस दौरान नात-मनकबत महशर बरेलवी, फ़ारूक मदनपुरी, हाजी गुलाम सुब्हानी, आसिम नूरी ने पेश की। कार्यक्रम का संचालन कारी यूसुफ रज़ा संभली ने किया।
मुल्क के अमन को दुआएं

फज्र नमाज के बाद क़ुरानख्वानी हुई। इसके बाद दिनभर नात और मनक़बत पेश की गई। रात 9 बजे से उलेमा ने तक़रीर की। 10:35 बजे कुल शरीफ और मुल्क व मिल्लत की खुशहाली की दुआ की गई। इसके बाद दस्तारबंदी समारोह हुआ। सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां ने कहा “हर शख्स खुद और अपने बच्चों को इल्म-ए-दीन ज़रूर सिखाए। बरेलवी मिशन को मोहब्बत, अमन और सुन्नी सूफी खानकाही पैगाम के साथ दुनिया तक पहुंचाना है।”
इल्म सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि इत्तेहाद और मोहब्बत का पैगाम

उर्स के दौरान मुफ्ती सलीम नूरी बरेलवी ने कहा “इल्म सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि इत्तेहाद और मोहब्बत का पैगाम है। अपने मज़हब के साथ मुल्क से मोहब्बत का संदेश आम करें।”हुज्जातुल इस्लाम की अरबी और फिकही महारत पर रोशनी डाली। इल्मी खिदमात, फतावा लेखन और शायरी को याद किया गया। सूफी विचारधारा और इत्तेहाद को देश के अमन और भाईचारे का आधार बताया गया। इस दौरान राशिद अली खान, मौलाना अबरार-उल-हक, शाहिद नूरी, नासिर कुरैशी, हाजी जावेद खान सहित बड़ी संख्या में रज़ाकारों ने व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारियाँ निभाईं।
