नई दिल्ली : देश की सियासत में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिला है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है। इस घटनाक्रम को लेकर विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर हमलावर है और इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला कदम बता रहा है।
वहीं आम आदमी पार्टी ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा कदम उठाया है। पार्टी नेता संजय सिंह ने जानकारी दी है कि पार्टी ने राज्यसभा के सभापति को एक औपचारिक याचिका सौंपी है, जिसमें उन सात सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई है, जिन्होंने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा है।
संजय सिंह का कहना है कि जो सांसद अब पार्टी के साथ नहीं हैं, उन्हें सदन में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी छोड़ने के बाद भी इन सांसदों का पद पर बने रहना लोकतांत्रिक मूल्यों और नियमों के खिलाफ है। इस पूरे राजनीतिक विवाद के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन सांसदों पर दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई होगी या नहीं। भारत में दल-बदल कानून को 1985 में संविधान के 52वें संशोधन के तहत लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य चुने हुए प्रतिनिधियों को पार्टी बदलने से रोकना और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।
इस कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय सदन के सभापति या अध्यक्ष के हाथ में होता है, जो सभी तथ्यों और परिस्थितियों की जांच के बाद फैसला लेते हैं।
फिलहाल इस पूरे मामले में राजनीतिक घमासान तेज है और सभी की नजर अब सभापति के फैसले पर टिकी हुई है, जो यह तय करेगा कि इन सांसदों की सदस्यता रहेगी या खत्म होगी।
