बरेली : वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और उद्यमी डॉ. पवन सक्सेना ने मीडिया की दुनिया, राजनीति और अपने निजी जीवन के अनुभवों को बेहद बेबाकी से एक मीडिया चैनल पर साझा किया। यह इंटरव्यू न सिर्फ एक पत्रकार की यात्रा का आईना है, बल्कि वर्तमान मीडिया पर गंभीर सवाल भी खड़े करता है। उन्होंने तीन दशक की पत्रकारिता यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। डॉ. सक्सेना ने बताया कि पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने 1993 में एक सांध्य दैनिक से की। इसके बाद अमर उजाला, दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में उन्होंने वर्षों तक काम किया। वर्तमान में वे दैनिक भास्कर से जुड़े हैं। उन्होंने कहा, “मीडिया मेरा पहला प्यार है, और मैंने कोशिश की कि इसमें निरंतर बने रहूं।”
मीडिया बनाम बिजनेस एक संतुलन
पत्रकारिता के साथ-साथ बिजनेस में उतरने के फैसले पर उन्होंने कहा, “जब मीडिया में आया था, सोचा था यही सब कुछ है। लेकिन जल्द समझ आया कि व्यापार भी जरूरी है।” आज वे एक सफल उद्यमी भी हैं और मल्टी-डायमेंशनल वर्किंग को अपनी ताकत मानते हैं।
मीडिया की गिरती साख पर चिंतन
वर्तमान मीडिया की स्थिति पर उन्होंने कहा, “मीडिया कभी स्वर्णकाल में नहीं रहा, लेकिन अब जो गिरावट है, वह चिंताजनक है। हम डिजीटल इंडिया नहीं, डिजीटल यूजर इंडिया हैं। आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा गोदी में बैठा है।” उन्होंने कहा कि स्वतंत्र मीडिया की जिम्मेदारी जनता की भी है। उन्हें नागरिक बनकर सोचना होगा, सिर्फ प्रजा नहीं।
राजनीति में कदम और अनुभव
2022 में राजनीति में जाने के अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने कहा, “मित्रों और शुभचिंतकों की इच्छा से राजनीति में कदम रखा। यह सीखने का अनुभव था। कुछ दोस्त दुश्मन बने और कुछ दुश्मन, दोस्त, लेकिन राजनीति में टाइमिंग सबसे जरूरी होती है।” 2027 में चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने चतुराई से मुस्कराते हुए कहा, “अभी निर्णय लेने का वक्त नहीं आया है। लेकिन अगर जनता और शुभचिंतक चाहेंगे, तो आगे का रास्ता खुला है।”
एक विधायक की सोच, संवेदनशीलता और समृद्धि
एक जनप्रतिनिधि की भूमिका पर उन्होंने स्पष्ट कहा, “सड़क और नाली विकास नहीं, प्रक्रिया है। असली विकास है पर कैपिटा इनकम और समृद्धि। एक विधायक को संवेदनशील होना चाहिए, अपने लोगों से रिश्ता बनाना आना चाहिए। ”उन्होंने कहा कि सत्ता किसी की भी हो, सवाल उसे डराते हैं।मीडिया में चतुराई भरी बेइमानी और कंटेंट की गिरावट चिंता का विषय है। देश को डिजीटल यूजर इंडिया नहीं, जागरूक नागरिकों का इंडिया बनाना होगा। मीडिया सिर्फ दिखाने का माध्यम नहीं, विचार निर्माण का कैटेलिस्ट है।राजनीति में जाने के लिए ‘सही समय’ जरूरी है।
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