नई दिल्ली : उन्नाव दुष्कर्म मामले में पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की मुश्किलें फिलहाल कम होती नजर नहीं आ रही हैं। सोमवार को उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई टाल दी गई है। अब इस मामले पर मई के पहले सप्ताह में सुनवाई होने की संभावना है। यह सुनवाई केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की उस याचिका पर होनी थी, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है।
दरअसल, दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित करने का आदेश दिया था, जिसके बाद सीबीआई इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहुंची। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने होनी थी, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ सबरीमाला मामले की सुनवाई में व्यस्त है। इसी वजह से इस केस की सुनवाई को आगे बढ़ा दिया गया।
सुनवाई के दौरान सेंगर की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल को पीड़िता के पिता की मौत से जुड़े मामले में 10 साल की सजा भी सुनाई गई है, जिसमें वह काफी समय जेल में बिता चुके हैं। रोहतगी ने अदालत को बताया कि सेंगर करीब 7 साल 5 महीने की सजा काट चुके हैं और उनकी सजा का एक बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है। ऐसे में उन्हें जमानत दी जानी चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पीड़िता के वकील की ओर से जानबूझकर सुनवाई में देरी की जा रही है, ताकि सेंगर को राहत न मिल सके। हालांकि, पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया और कहा कि यह आरोप निराधार हैं।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा कानूनी विवाद ‘लोक सेवक’ यानी पब्लिक सर्वेंट की परिभाषा को लेकर सामने आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने 23 दिसंबर 2025 के आदेश में कहा था कि सेंगर को पॉक्सो कानून के तहत सजा मिली है, लेकिन एक विधायक भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर अदालत ने यह भी कहा था कि चूंकि सेंगर काफी समय जेल में बिता चुका है, इसलिए उसकी अपील लंबित रहने तक सजा को निलंबित किया जा सकता है।
सीबीआई ने इस तर्क का कड़ा विरोध किया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि यह एक नाबालिग बच्ची से जुड़ा बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला है। उन्होंने यह भी दलील दी कि सांसद और विधायक ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में आते हैं और इस संबंध में उन्होंने पूर्व के मामलों का हवाला भी दिया। सीबीआई का कहना है कि उच्च न्यायालय ने सेंगर को लोक सेवक न मानकर गंभीर कानूनी त्रुटि की है।
गौरतलब है कि इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने 29 दिसंबर 2025 को ही दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिससे सेंगर की रिहाई का रास्ता साफ हो सकता था। शीर्ष अदालत ने तब कहा था कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न जुड़े हुए हैं, जिनका समाधान आवश्यक है।
फिलहाल स्थिति यह है कि कुलदीप सिंह सेंगर जेल में ही रहेगा, क्योंकि उसे अन्य मामलों में भी जमानत नहीं मिली है। यह पूरा मामला वर्ष 2017 का है, जिसने पूरे देश में व्यापक चर्चा और आक्रोश पैदा किया था। बाद में वर्ष 2019 में इस केस को उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया था, ताकि निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित की जा सके।
