अंग्रेज़ भी कांपते थे, गांधी, खिलाफत और हिंदू-मुस्लिम एकता के शिल्पी
शहीद तेरी मौत ही तेरे वतन की ज़िंदगी, तेरे लहू से जाग उठेगी इस चमन की ज़िंदगी…ये शेर बिल्कुल मौलाना महमूद हसन के लिए लिखा गया है। शेख़ुल हिंद मौलाना महमूद हसन सिर्फ़ एक इस्लामी आलिम ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की आज़ादी की उस पहली गूंज के रहनुमा थे। जिसने हिंदू-मुस्लिम को एक झंडे तले ला खड़ा किया। देवबंद के दारुल उलूम से लेकर माल्टा की जेल तक, उनकी ज़िंदगी का हर लम्हा इस मुल्क की आज़ादी के नाम रहा। 1916 का मशहूर “रेशमी रुमाल” या Silk Letter Conspiracy उनकी क़यादत का वो चैप्टर है। जिसने अंग्रेज़ों की नींदें उड़ा दीं। मौलाना हुसैन अहमद मदनी, उबैदुल्लाह सिंधी, राजा महेंद्र प्रताप और रास बिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर उन्होंने वो नक्शा तैयार किया। जिससे हिंदू और मुसलमान दोनों की एकजुट बग़ावत का बिगुल बज सकता था।
अंग्रेजों की साजिश भी न तोड़ पाई हौसले
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अंग्रेज़ों को डर था कि अगर शेख़ुल हिंद को हिंदुस्तान में सज़ा दी गई, तो वही होगा जो लोकमान्य तिलक के साथ हुआ- एक शहीद, एक रहबर और एक ज़िंदा लिजेंड बन जाएंगे। इसलिए उन्हें माल्टा जेल भेजा गया। यहां उन्हें जंगी क़ैदी बनाकर रखा गया। लेकिन साज़िशें भी उनके हौसले को तोड़ नहीं पाईं।
वतन लौटने पर गांधी ने किया खैरमखदम
1920 में जब वो वतन लौटे, तो महात्मा गांधी और तमाम राष्ट्रवादी नेताओं ने उनका इस्तक़बाल किया। बीमार जिस्म के बावजूद, उन्होंने हिंदुस्तान के कोने-कोने में घूमकर आज़ादी का पैग़ाम पहुँचाया। 30 नवंबर 1920 को वो दुनिया से रुख़सत हो गए, लेकिन उनकी तहरीक आज भी जिंदा है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, खिलाफत आंदोलन, और हिंदू-मुस्लिम एकता के उस ख़्वाब में जो उन्होंने देखा था।शेख़ुल हिंद का नाम इतिहास के उन पन्नों पर सुनहरी स्याही से लिखा जाएगा, जहाँ हिंदुस्तान के गुमनाम हीरोज़ की दास्तानें दर्ज हैं।
