नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने साल 2024 के चर्चित पुणे पोर्श कार हादसा मामले में तीन आरोपियों को जमानत दे दी है। इस हादसे में दो आईटी पेशेवरों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जिसके बाद यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में एक अहम सामाजिक टिप्पणी भी की है।
मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल नाबालिग को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि माता-पिता की जिम्मेदारी भी तय होती है। बेंच ने सख्त शब्दों में कहा कि नशे की समस्या अलग विषय है, लेकिन नाबालिग बच्चों को कार की चाबियां और खुला पैसा देना ताकि वे ऐश कर सकें, यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। गौरतलब है कि इससे पहले दिसंबर 2024 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अमर गायकवाड़ समेत आठ आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा था और अब तीन आरोपियों को जमानत दे दी गई है।
यह मामला केवल सड़क हादसे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ब्लड सैंपल बदलने जैसे गंभीर आरोपों के कारण और भी संवेदनशील बन गया। इस मामले में कुल 10 लोगों को जेल भेजा गया था, जिनमें नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरी हालनोर, ससून अस्पताल का कर्मचारी अतुल घाटकांबले और दो बिचौलिए शामिल थे। यह हादसा पुणे शहर में 18-19 मई 2024 की दरम्यानी रात को हुआ था, जब करीब तीन करोड़ रुपये की पोर्श कार तेज रफ्तार में चलाते हुए 17 वर्षीय नाबालिग ने एक बाइक को टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भीषण थी कि बाइक सड़क पर काफी दूर तक घिसटती चली गई और उस पर सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी।
घटना के करीब 14 घंटे बाद नाबालिग को कोर्ट से शर्तों के साथ जमानत मिल गई थी, जिसमें ट्रैफिक पुलिस के साथ काम करने और सड़क दुर्घटनाओं पर निबंध लिखने का निर्देश शामिल था। हालांकि, बढ़ते विरोध के बाद उसकी जमानत रद्द कर दी गई और उसे ऑब्जर्वेशन होम भेजा गया। बाद में जून 2024 में हाई कोर्ट ने उसकी रिहाई का आदेश दिया था।
