अंग्रेजों ने शाहनवाज खान को बरेली नहीं उतरने दिया, तो रुमाल फेंककर दिया संदेश, फिर 500 रूपये में नीलामी
बरेली : भारत की आज़ादी की जंग में बरेली ने एक अहम और ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां, नज्जू और बुलंद खां, सूबेदार बख्त खां जैसे वीरों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ कई बार संघर्ष किया, और अपनी जान की कुर्बानी देकर रुहेलखंड को बार-बार आज़ाद कराया। इनके संघर्ष के निशान आज भी कमिश्नरी से लेकर फतेहगंज पश्चिमी तक मौजूद हैं। आज़ादी की लड़ाई में बरेली के क्रांतिकारियों ने महात्मा गांधी से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस तक के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया। नेताजी कई बार बरेली आए, लेकिन उनका अंतिम दौरा वर्ष 1938 में था, जब उन्होंने सरस्वती सेकेंडरी स्कूल में ऐतिहासिक जनसभा की।
आज़ादी केवल अहिंसा से नहीं, क्रांति से हासिल…
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बरेली में अपने अंतिम जोशीले संबोधन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा “देश को आज़ादी केवल अहिंसा से नहीं मिलेगी, यह लक्ष्य सिर्फ क्रांति से हासिल किया जा सकता है।”सभा में बड़ी संख्या में क्रांतिकारी मौजूद थे। अनुज धार की किताब नेताजी की “द अनटोल्ड स्टोरी” में लिखा है बरेली के कई युवाओं ने आज़ाद हिंद फौज में शामिल होकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी। जनसभा की अध्यक्षता उस वक्त के प्रिंसिपल विशंभर नाथ ने की। इसमें बाद आज़ाद हिंद फौज के कर्नल अमर बहादुर सिंह, शाहनवाज खान और सहगल को जेल से छूटने के बाद सम्मानित किया जाना था। शाहनवाज खान को बरेली बुलाया गया, लेकिन ब्रिटिश अफसरों ने उनके विमान को बरेली में उतरने की अनुमति नहीं दी।
रुमाल फेंककर दिया संदेश
कर्नल जीएस ढिल्लन की किताब ” द इंडियन नेशनल आर्मी एवं नेताजी” (The Indian National Army and Netaji) में लिखा है कि अंग्रेजों ने नेताजी के साथ कदम से कदम मिलकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले शाहनवाज खान का विमान बरेली में नहीं उतरने दिया। इसके बाद उन्होंने रूमाल में संदेश लिखकर हवाई जहाज से नीचे गिरा दिया। इस सन्देश में लिखा था कि वे रामपुर में उतरेंगे। इसके बाद बरेली के लोगों ने रामपुर में शाहनवाज खान का स्वागत किया। मगर, संदेश देने वाला यह रूमाल 500 रुपये में नीलाम हुआ था। उस समय यह एक बड़ी रकम थी।
नेताजी देशद्रोह में गिरफ्तार
बरेली से जाने के बाद अंग्रेजी फौज नेताजी की तलाश में जुट गई थी। उन्होंने नेताजी को 2 जुलाई 1940 को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया। मगर, 29 नवंबर 1940 को जेल में भूख हड़ताल करने के बाद रिहा किया गया, और 5 दिसंबर 1940 को उन्हें नज़रबंद कर दिया गया।
नौजवान तूफान की तरह
नेताजी ने बरेली में युवाओं में जोश भरते हुए कहा था कि “नौजवान तूफान की तरह होता है, जो अपनी पर आ जाए तो बड़े से बड़े दरख़्त को जड़ों समेत उखाड़ देता है।”नेताजी सफेद शाल ओढ़कर मंच पर बैठते थे। वह बड़ों से लेकर बच्चों तक सभी से देशभक्ति की बातें करते थे, और हर रूप में खुद को ढाल लेते थे।
