बचपन से इल्म और रूहानियत की रोशनी में पले-बढ़े आला हजरत, रोजमर्रा के मुद्दों पर शरीयत के मुताबिक फ़ैसले
बरेली : यूपी के शहर बरेली की पहचान सुन्नी मरकज के रूप में पूरी दुनिया में कराने वाले फाजिल-ए- बरेलवी इमाम अहमद रजा खां (आला हजरत) की यौम-ए-पैदाइश (जन्म) 14 जून 1856 ई. यानी 10 शव्वाल 1272 हिजरी को मोहल्ला जसोली (अब जखीरा) में हुई थी। आप उस वक्त के मशहूर मुफ़्ती नकी अली खान के बेटे थे। आपका असली नाम मुहम्मद अहमद रखा गया। बचपन से मजहबी माहौल मिला और इल्म-ए-दीन की तरफ रुझान रहा 1860 ई में सिर्फ 4 साल की उम्र में कुरान का नाजरा (पूरी तिलावत) पूरा कर लिया। इसके साथ ही 7 साल की उम्र में पहला रोजा रखा, और 8 साल की उम्र में “हिदायतुन्ह” किताब का अरबी में अनुवाद किया। आपने 13 साल 4 माह 10 दिन की उम्र में “मां के दूध के हुक्म पर पहला फतवा लिखा” और उसी दिन से फतवानवीसी का आगाज हुआ, जो 1921 ई. तक जारी रहा।
रोजमर्रा के मुद्दों पर शरीयत के मुताबिक दिए फैसले
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आला हजरत ने अपनी किताबों, तफसीरों और फतवों के जरिए नमाज, रोजा, जकात, हज, पाकी (तहारत), तलाक, निकाह, विरासत, बैंकिंग, करेंसी नोट, बीमा,राजनीतिक मसलों, और रोजमर्रा के मुद्दों पर शरीयत के मुताबिक फैसले दिए। इन पर अकीदतमंद (लोग) आज भी अमल करते हैं।
सबसे मशहूर फतावा रजविया
आला हजरत की फतावा रजविया सबसे मशहूर है। इसके के करीब 30 वॉल्यूम है, जो आज भी पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन का स्रोत है। इसके अलावा आला हजरत की अजल्ला अल-इल्म अन्न अल -फ़तवा मुसल्लक़ान अला क़वल अल-इमाम, अस्सिर्स अल-मुअद्दल फ़ी अद्दी मा अल-मुस्तामल, जुमान अत-ताज फ़ी बयानी कि सलाती क़बल अल-मीराज़, नहजु अस्सलामा फ़ी अह्कामि तक़बीलि इबहामैनि फ़िल इक़ामा, इज़ानुल अजर फ़ी अज़ानी अल-क़ब्र, इज्तिनाब अल-उम्माल व फ़तवा अल-जुह्हाल, अफ़आलुल लुमाह फ़ी अज़ानी यौम अल-जुमुआह, सुरूरुस सैय्यिद अस्सईद फ़ी अज़द्दुआ बअदा सलातिस्सैय्यिद, विशाऊल जिद फ़ी तअलील मुआनकातिस्सैय्यिद, अल-उर्फ़ुल अहसन फ़िल किताबति अलल-कफ़न, अल-मिन्नतुल मुम्ताज़ा फ़ी दअवतिल जनाज़ा, बज़्लुल जवाइज़ अलाद-दुआ बअदा सलातिल जनाइज़, अन-नह्युल अज़ीज़ व तक़रीर सलातिल जनाइज़, इहलाकुल वह्हाबीयीन अला तौहीन क़ुबूरिल मुस्लिमीन, बरीक़ुल मनार बी शुमूअिल मज़ार, अल महफूज,कंजुल ईमान, और हदयाक- ए-बख्शीश समेत करीब 1100 से किताब लिखीं हैं।
30 साल की उम्र में लिख चुके थे 75 किताब
आला हजरत का इल्मी सफर काफी अजीम और काबिले तारीफ (अद्भुत और प्रेरणादायक है। सिर्फ 30 वर्ष की आयु में (1887) 75 किताब लिख दी थी, जबकि 1909 में 43 वर्ष की आयु में यह संख्या बढ़कर 500 तक पहुँच गई। इस्लामिक विद्वानों (मुफ्ती आलिम) का अनुमान है कि उन्होंने इल्म की 1000 से ज्यादा किताबें लिखीं। उनके द्वारा लिखी 549 पुस्तकों को अलग-अलग विषयों में वर्गीकृत किया गया है। इसमें 11 कुरान की तफ़सीर, 54 अक़ाइद, 53 हदीस और उसूल -ए-हदीस, 214 फ़िक़्ह और उससे जुड़े विषय, 19 तसव्वुफ़ और नैतिकता, 40 पुस्तकों की समीक्षाएँ, 55 भाषा, व्याकरण और साहित्य, 11 जफ़र, 8 लघुगणक, 22 खगोल और ज्योतिष, 31 गणित और ज्यामिति, 7 दर्शन एवं विज्ञान, और 4 बीजगणित शामिल हैं। इस्लामिया यूनिवर्सिटी भावलपुर के प्रो. डॉ. मुहम्मद हसन ने उन्हें “ज्ञान की लहरों से भरा लेखक कहा था। बोले, उनको रोक पाना काफी मुश्किल था।
काबुल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने दी सलाह
काबुल यूनिवर्सिटी के प्रो. अब्दुल शकूर शाद ने सुझाव दिया था कि भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान की सांस्कृतिक संस्थाओं को उनके सभी लेखों को स्थायी रूप से अपने पुस्तकालयों में संरक्षित करना चाहिए। उनकी दिव्य स्मरण शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी पुस्तक का एक चौथाई भाग पढ़ने के बाद वे शेष भाग स्वयं पढ़कर याद कर लेते थे। केवल 8 साल की उम्र में उन्होंने “हिदायातुन नह्व” पर अरबी में लिखकर विद्वानों को चकित कर दिया था।
18 अगस्त से 107 वें उर्स का आगाज
आला हजरत का 107 वा उर्स बरेली समेत दुनिया भर में 18,19 और 20 अगस्त मनाया जाएगा। यह चांद की 23,24, और 25 सफर की तारीख होगी। उर्स को लेकर दरगाह, इस्लामिया मैदान और मदरसा जमीयतुर्रजा में तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसमें देश, और दुनिया के प्रमुख उलमा शामिल होंगे।
