मुहम्मद साजिद
21 जुलाई, 1942 को जन्मे मल्लिकार्जुन खड़गे सिर्फ एक नेता नहीं, संघर्ष की उस ज़मीन से निकले किरदार हैं, जो आज़ादी के बाद के भारत की जातीय, सामाजिक और राजनीतिक परतों को जीकर आए हैं। जब खड़गे महज़ 7 साल के थे, तब उन्होंने अपनी मां और बहन को अपनी आंखों के सामने जलते हुए देखा। उस आग से वो बच तो गए, मगर, उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। शायद तभी से उनके भीतर वो आग पैदा हुई, जो आज भी उन्हें 80 की उम्र में कांग्रेस को बचाने की हिम्मत देती है।
वो नेता जो तीन बार सीएम बनने से चूका, मगर पार्टी से न टूटा
12 चुनाव, 11 बार जीत, और तीन बार ऐसा मौका, जब वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। लेकिन न तो वो कभी ‘बागी’ हुए, और न ही ‘आलाकमान’ से खफा। कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें आज गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद नेताओं की कतार में लाकर खड़ा कर दिया है।
जब इंदिरा के खिलाफ बगावत की थी…
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1979 में जब उनके राजनीतिक गुरु देवराज उर्स ने इंदिरा गांधी से बगावत की, तो खड़गे ने भी पार्टी छोड़ दी थी। लेकिन कुछ ही महीनों में उन्हें अहसास हुआ कि कांग्रेस की राजनीति के बिना वो अधूरे हैं,और वे लौट आए। कांग्रेस से दूरी और फिर वापसी ने उन्हें और मजबूत किया।
2014 की हार में भी मिली कांग्रेस की कमान
जब कांग्रेस 2014 में सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई, तब भी लोकसभा में उसका चेहरा मल्लिकार्जुन खड़गे ही बने। उन्होंने कहा था “हम पांडव हैं, संख्या कम है, लेकिन हिम्मत नहीं।” उनका हिंदी भाषण आज भी लोकसभा में गूंजता है।
83 की उम्र में भी सड़कों पर
2022 में जब सोनिया गांधी को ED ने तलब किया, तब उनके 80वें जन्मदिन पर उन्होंने केक नहीं काटा। बल्कि दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन किया। यही खड़गे की पहचान है, नेता नहीं, सेनापति। 80 की उम्र में जब लोग रिटायर होते हैं, तो खड़गे कांग्रेस को री-टायर कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने अपनी सबसे कठिन लड़ाई के लिए सबसे तपे हुए योद्धा को चुना है।
