लाइक-कमेंट की दुनिया में खोने लगी असली खुशी? अब GDP नहीं, GNH का दौर
संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियंस
आज पूरी दुनिया 20 मार्च को इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे 2026 (International Day of Happiness) मना रही है। यह दिन केवल औपचारिक उत्सव नहीं,बल्कि इंसानी जीवन में खुशहाली के महत्व को समझाने का वैश्विक प्रयास है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सच में खुश हैं, या सिर्फ खुश दिखने की कोशिश कर रहे हैं? मशहूर शायर निदा फाज़ली की पंक्तियां-“किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए”आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो गई हैं, जब इंसान अपनी असली मुस्कान से ज्यादा आभासी दुनिया में खोता जा रहा है।
भारत ने सुधारी स्थिति, लेकिन चुनौती बरकरार
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा जारी वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत ने कुछ सुधार जरूर किया है। भारत 147 देशों में 118वें स्थान पर पहुंचा 2024 के 126वें स्थान से 8 पायदान सुधार हुआ है। रिपोर्ट के मानक तय हैं। इसमें प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक सहयोग, जीवन की स्वतंत्रता, उदारता और भ्रष्टाचार की धारणा, हालांकि, इसके बावजूद भारत अभी भी निचले पायदानों में शामिल है, जो इस बात का संकेत है कि आर्थिक विकास के बावजूद सामाजिक और मानसिक संतुलन की चुनौती बनी हुई है।
फिनलैंड आठवीं बार पहले स्थान पर
दुनिया में फिनलैंड लगातार आठवीं बार सबसे खुशहाल देश बना हुआ है, जो सामाजिक सुरक्षा, संतुलित जीवनशैली और मजबूत सामुदायिक ढांचे के लिए जाना जाता है। दुनिया में United Nations General Assembly ने 12 जुलाई 2012 को प्रस्ताव 66/281 पारित कर 20 मार्च को इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे घोषित किया था। संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया कि किसी देश की प्रगति का पैमाना केवल GDP नहीं हो सकता
खुशी को मानव का मूल अधिकार माना गया
भूटान के मॉडल से दुनिया को मिला GNH का मंत्र
खुशी के वैश्विक विमर्श की जड़ें भूटान से जुड़ी हैं। भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने 1970 के दशक में ‘सकल राष्ट्रीय खुशी’ यानी Gross National Happiness (GNH) की अवधारणा दी। इस मॉडल में चार प्रमुख आधार शामिल हैं, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण सुशासन। यही विचार बाद में वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया गया और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का आधार बना।
भारत में ‘खुशी’ पर बढ़ते प्रयोग
भारत में भी ‘खुशी’ को नीतिगत स्तर पर शामिल करने के प्रयास हुए हैं।2016 में मध्य प्रदेश ने ‘आनंद विभाग’ की स्थापना की, और 2018 में दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों में ‘हैप्पीनेस क्लास’ शुरू की। इन पहलों का उद्देश्य बच्चों और समाज में मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और भावनात्मक मजबूती को बढ़ावा देना है।
डिजिटल युग की विडंबना: आभासी खुशी, वास्तविक तनाव
आज का दौर तकनीक और सोशल मीडिया का है। युवा वर्ग का बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन तक सीमित लाइक, शेयर और फॉलोअर्स में खुशी तलाशने की प्रवृत्ति तुलना और प्रतिस्पर्धा से बढ़ता तनाव है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस डिजिटल निर्भरता ने वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर किए हैं। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ाईं हैं।अकेलेपन की भावना को गहरा किया
विशेषज्ञों की राय
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि खुशी का संबंध केवल भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि रिश्तों की गुणवत्ता, मानसिक संतुलन, जीवन में संतोष से होता है।
