हिंदी साहित्य के अमर कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार भीष्म साहनी के 110 वें जन्मदिन पर तमाम साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने भारत के विभाजन की त्रासदी को जिस सहजता और संवेदनशीलता से शब्दों में ढाला, वह आज भी पाठकों के दिल में जिंदा है। “तमस” जैसा ऐतिहासिक उपन्यास केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि भारत-पाक विभाजन का दस्तावेज़ है। जिसने समाज, राजनीति और इंसानी रिश्तों की जड़ों को हिला दिया।
जीवन और साहित्यिक यात्रा
भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में 8 अगस्त, 1915 को हुआ था। उनका लेखन किसी चमत्कारिक भाषा-शैली पर नहीं, बल्कि सरल, सच्ची और भंगिमारहित हिंदी पर आधारित था। ऐसी हिंदी जो गांव-शहर के हर पाठक को सीधे दिल से जोड़ देती थी। उनकी प्रमुख कृतियाँ तमस, हानूश, कबिरा खड़ा बाजार में, मुख्य की दावत, बांँगचू, अमृतसर आ गया आदि हैं। इसके साथ ही अनुवाद कार्य लियो टॉल्स्टॉय का पुनरुत्थान और चिंगिज़ एत्मातोव का पहला अध्यापक है।
भीष्म साहनी के व्यक्तित्व का जादू
साहित्य में उनकी तरह का व्यक्तित्व दुर्लभ था। साधारण, विनम्र और अहंकार रहित। वे न केवल बड़े लेखक थे, बल्कि समान संवेदनाओं वाले सच्चे इंसान भी। किसी भी आयोजन में उन्हें कुर्सी पर नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच फर्श पर बैठा देखा जा सकता था।
तमस और देशव्यापी चर्चा
1988 में दूरदर्शन पर “तमस” धारावाहिक के प्रसारण के बाद भीष्म साहनी घर-घर में पहचाने जाने लगे। इस धारावाहिक ने विभाजन के दर्द को सिर्फ किताबों में कैद रहने से निकालकर करोड़ों आंखों तक पहुंचा दिया।
नाट्य जगत में योगदान
इप्टा के लिए कबिरा खड़ा बाजार में, मुआवजे और चीफ़ की दावत जैसे नाटकों ने सामाजिक मुद्दों को मंच पर जीवंत किया। इन नाटकों में भी उनकी वही ईमानदार और सीधी संवेदनशीलता दिखती है, जो उनके गद्य में है।
आज के दौर में भी प्रासंगिक
आज जब समाज में विभाजनकारी ताकतें सक्रिय हैं, भीष्म साहनी का साहित्य हमें इंसानियत, आपसी सद्भाव और लोकतांत्रिक मूल्यों की याद दिलाता है। उनका लेखन हमें चेतावनी देता है कि नफरत की राजनीति हमेशा आम इंसान को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। उनका निधन 11 जुलाई, 2003 को हुआ था।
