नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने राजधानी में बाल तस्करी के गंभीर हालात उजागर कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली अब बाल तस्करी की “मंडी” बनती जा रही है और हालात इतने खराब हैं कि इसे समझने के लिए किसी रिपोर्ट की जरूरत नहीं, बस रेलवे स्टेशनों के आसपास दो घंटे घूमना काफी है।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए रेलवे, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद बाल तस्करी पर प्रभावी रोक नहीं लग पाई है।
अदालत ने यह भी माना कि संबंधित विभागों ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं होने के कारण हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ। कोर्ट ने बाल संरक्षण आयोग से विस्तृत आंकड़े और ठोस सुझाव देने को कहा है।
याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि साल 2018 से 2024 के बीच रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स ने रेलवे परिसरों से 84 हजार से ज्यादा बच्चों को रेस्क्यू किया है। इसके बावजूद तस्करी का नेटवर्क लगातार सक्रिय बना हुआ है। एक चौंकाने वाला मामला भी सामने आया, जहां आनंद विहार रेलवे स्टेशन से बचाई गई एक बच्ची को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के बजाय दोबारा तस्करों के हवाले कर दिया गया, जिसे बाद में फिर से रेस्क्यू करना पड़ा।
याचिका में यह भी कहा गया है कि बच्चों की पहचान, बचाव और पुनर्वास के लिए बनाई गई गाइडलाइंस का गंभीर उल्लंघन हो रहा है, जिससे तस्करी पर लगाम नहीं लग पा रही। फिलहाल, दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सभी एजेंसियों से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई को होगी। अब देखना होगा कि क्या इस बार बाल तस्करी के खिलाफ जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं।
