लेखक मुहम्मद साजिद
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख्र करेंगी…ये शब्द कैप्टन अब्बास अली के जीवन के लिए गूंजते हुए सत्य प्रतीत होते हैं। वे एक ऐसे क्रांतिकारी थे, जो अंग्रेजों की सेना में शामिल हुए, लेकिन मक़सद सिर्फ एक था, दुश्मन की व्यवस्था को भीतर से तोड़कर भारत मां (देश) को आज़ाद करवाना। कैप्टन अब्बास अली का जन्म 3 जनवरी, 1920 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा के कलंदर गढ़ी गांव में हुआ था। उनके पूर्वज 1857 की क्रांति में शामिल होकर शहीद हुए। यही वीरता उनके लहू में बह रही थी। भगत सिंह की शहादत से प्रेरित होकर उन्होंने बचपन में ही बगावत के बीज बो दिए थे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर नौजवान भारत सभा और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़े। 1939 में अंग्रेजों की सेना में शामिल होना उनका रणनीतिक निर्णय था, ताकत और रणनीति उन्हीं के हथियारों से सीखनी थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे मलाया और बर्मा के मोर्चों पर तैनात रहे।
नेताजी के आह्वान पर ‘बग़ावत’
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1945 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान पर उन्होंने अंग्रेजी फौज से बगावत कर दी, और आज़ाद हिंद फौज (INA) में शामिल हो गए। लेकिन यह राह आसान नहीं थी। वे गिरफ्तार हुए, कोर्ट मार्शल चला और फांसी की सज़ा सुना दी गई। मगर, किस्मत ने साथ दिया। भारत आज़ाद हुआ, और वह मौत के मुंह से लौट आए।
आजादी के बाद समाजवादी राजनीति में नेतृत्व
स्वतंत्रता के बाद कैप्टन साहब ने हथियार छोड़ कलम और विचारधारा का रास्ता अपनाया। डॉ. लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं के साथ जुड़कर समाजवादी आंदोलन के स्तंभ बने। 1967 में उन्होंने यूपी में कांग्रेस के विकल्प के रूप में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई। 1975 के आपातकाल के दौरान उन्हें 19 महीने तक जेल में रखा गया, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांत नहीं छोड़े।
न रहूं किसी का दस्तनिगर, एक ऐतिहासिक दस्तावेज़
उनकी आत्मकथा “न रहूं किसी का दस्तनिगर, मेरा सफ़रनामा” न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की कहानी है, बल्कि 20वीं सदी के भारतीय समाज और राजनीति की जीवंत झलक भी है।
धरोहर के तौर पर याद किया जाना चाहिए
कैप्टन अब्बास अली सिर्फ एक नाम नहीं, एक प्रेरणा हैं, एक ऐसे योद्धा जो धर्म, जाति, मजहब के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर भारत के लिए लड़े। आज जब भारत को फिर से समानता, बलिदान और सच्ची देशभक्ति की ज़रूरत है, कैप्टन साहब की कहानी एक जीवंत प्रेरणा है। हमें फिर से ऐसे कप्तानों की ज़रूरत है — जो बिना वर्दी के भी राष्ट्र की सेवा करें!
