नई दिल्ली : नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोमवार को उस वक्त माहौल गरमा गया, जब केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के पूर्व अधिकारी, जवान और उनके परिजन बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए। यह प्रदर्शन केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) बिल, 2026’ के खिलाफ किया गया। ‘अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन’ के बैनर तले आयोजित इस प्रदर्शन में शामिल लोगों ने एक स्वर में इस बिल को वापस लेने की मांग उठाई और सरकार पर उनके हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह प्रस्तावित बिल केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के मौजूदा ढांचे और उनके अधिकारों को प्रभावित करेगा। उनका आरोप है कि सरकार ने इस बिल को लाने से पहले पूर्व कैडर अधिकारियों या संबंधित हितधारकों से कोई चर्चा नहीं की। इससे करीब 12 लाख वर्तमान कार्मिक और लगभग 17 लाख से अधिक रिटायर्ड कर्मियों के साथ-साथ उनके परिवारों पर असर पड़ सकता है।
बीएसएफ के पूर्व डीआईजी धमेंद्र पारिख ने कहा कि सरकार को 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का सम्मान करना चाहिए, लेकिन इसके उलट यह बिल उसी फैसले को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस बिल के जरिए न्यायालय के निर्णय को पलटने की कोशिश करती है तो वे कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह आंदोलन केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में देशभर में व्यापक स्तर पर इसे चलाया जाएगा।
प्रदर्शन में शामिल पूर्व अधिकारियों ने बिल को भेदभावपूर्ण करार देते हुए कहा कि इससे कैडर अफसरों के हितों पर गंभीर आघात पहुंचेगा। उनका कहना है कि इस बिल के लागू होने से पदोन्नति के अवसर और भी सीमित हो सकते हैं, जिससे पहले से ही जूझ रहे प्रमोशन संकट में और बढ़ोतरी होगी। बीएसएफ के पूर्व डीआईजी जेएस भल्ला ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह एक तरह का “काला नियम” है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खत्म करने के लिए लाया जा रहा है।
भल्ला ने यह भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था में ही कैडर अधिकारियों को पहली पदोन्नति पाने में 15 से 16 साल का लंबा समय लग जाता है। कई मामलों में तो जवान 22 साल की सेवा पूरी करने के बाद भी हवलदार तक नहीं बन पाते। ऐसे में अगर नए बिल में पदोन्नति नीति को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया, तो स्थिति और खराब हो सकती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (NFFU) जैसे लाभ देने से भी बच रही है, जिससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी मुद्दा उठाया कि सरकार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की स्थिति को लेकर दोहरा रवैया अपना रही है। जब बात पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने की आती है, तो इन बलों को सिविलियन फोर्स बताया जाता है, लेकिन जब प्रशासनिक नियंत्रण या अन्य पहलुओं की बात होती है, तो इन्हें ‘संघ के सशस्त्र बल’ कहा जाता है। धमेंद्र पारिख ने इस विरोधाभास को उजागर करते हुए कहा कि सरकार अपनी सुविधा के अनुसार इन बलों की श्रेणी बदलती रहती है, जो पूरी तरह अनुचित है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय बलों को ‘भारत संघ के सशस्त्र बल’ मानते हुए उन्हें पुरानी पेंशन योजना का लाभ देने की बात कही थी, लेकिन सरकार ने उस निर्णय को लागू नहीं किया। अब नए बिल में फिर से इन बलों की परिभाषा बदली जा रही है, जिससे भ्रम और असंतोष दोनों बढ़ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस बिल को सोमवार को राज्यसभा में पेश किए जाने की संभावना थी, लेकिन देर शाम तक इसे पेश नहीं किया गया। माना जा रहा है कि सरकार इस बिल के प्रावधानों पर पुनर्विचार कर रही है। इस बीच कई विपक्षी सांसदों ने भी केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर इस बिल पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं और इसे पुनः समीक्षा के लिए भेजने की मांग की है।
विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों ने साफ तौर पर कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों को नजरअंदाज करती है, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि यह केवल पूर्व अधिकारियों या जवानों का मुद्दा नहीं है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े लाखों परिवारों के सम्मान और अधिकारों का सवाल है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह सभी पक्षों से संवाद कर एक संतुलित और न्यायसंगत निर्णय ले, ताकि बलों का मनोबल बना रहे और उनकी सेवाओं का उचित सम्मान हो सके।
