पृथ्वीराज सिंह और शीला देवी असहयोग आंदोलन के नायक
बरेली : मुल्क की आज़ादी में बरेली की भूमिका बेहद अहम रही है। यहां के गांवों से भी स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे क्रांतिकारी निकले, जिनके हौसलों से अंग्रेजी हुकूमत तक घबरा जाती थी। ऐसा ही एक गांव है फरीदपुर तहसील का बुधौली, जिसे ब्रिटिश फौज ने घेराबंदी कर दी थी। मगर, क्रांतिकारियों के हौसले पस्त नहीं हुए।
ब्रिटिश हुकूमत ने किया नजरबंद, शीला देवी कमांडर
1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में यहां के पृथ्वीराज सिंह और उनकी पत्नी शीला देवी ने सक्रिय भूमिका निभाई। शीला देवी महिला कांग्रेस की कमांडर थीं। क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते ब्रिटिश फौज ने दोनों को नजरबंद कर दिया। गांव पर पाबंदियां लगाईं और जुल्म ढाए, लेकिन यह गांव स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ बना रहा।
ब्रिटिश नौकरी छोड़कर आज़ादी की राह
राय बहादुर ठाकुर लखन सिंह के पुत्र पृथ्वीराज सिंह डिप्टी कलेक्टर थे, लेकिन गांधी और नेहरू के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी, और कांग्रेस का झंडा थाम लिया। बड़े भाई ठाकुर बख्तावर सिंह के समझाने पर भी वे नहीं माने। जिसके चलते परिवार ने ज़मींदारी में दीवार खड़ी कर दी। इसके बाद वे प्रदेश के बड़े कांग्रेस नेता बने।
आज़ादी के बाद की राजनीतिक यात्रा
आज़ादी के बाद, उनके बेटे बृजराज सिंह “आछू बाबू” को 1962 में बरेली लोकसभा सीट से कांग्रेस ने टिकट दिया, और वे सांसद बने। 1978 में भी वे दोबारा सांसद बने। इसी गांव से कुंवर सर्वराज सिंह जैसे जनप्रतिनिधि निकले। वर्तमान में कुंवर महाराज सिंह एमएलसी हैं। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, इस गांव को महाराजा परीक्षित के वंशज मुरलीधर सिंह ने बसाया था, और यहां कभी नील की खेती होती थी। यहां के जमींदारों ने शिकार के लिए पीलीभीत का माला जंगल भी खरीदा था।
