बरेली वाया अजमेर-भुज को चलाई गई आला हजरत एक्सप्रेस, दरगाह पर हेलीकॉप्टर से फूलों की बारिश
मुहम्मद साजिद
यूपी के एटा ज़िले के मारहरा शरीफ़ से लेकर बरेली तक, और फिर पूरी दुनिया में इस्लामी इल्म, और तहज़ीब की रोशनी फैलाने वाले आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी का नाम न सिर्फ़ उपमहाद्वीप में बल्कि पूरी दुनिया के सुन्नी मुसलमानों के बीच इज़्ज़त और मोहब्बत से लिया जाता है। आला हजरत ने दुनिया में दीनी रोशनी फैलाई, और हमेशा इंसानियत का पैगाम दिया। जिसके चलते “भारत सरकार ने भी आला हजरत को सलाम किया। आला हजरत के नाम से 31 दिसंबर 1995 को, उनकी 75वीं बरसी पर भारत सरकार ने एक स्मारक डाक टिकट जारी कर खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की थी। इस डाक टिकट का मूल्य 1.00 रूपये था। टिकट पर आला हजरत दरगाह के गुंबद की तस्वीर भी लगी थी। इसका मकसद (उद्देश्य) उनकी दीनी, और इल्मी सेवाओं को सलाम पेश करना था।
आला हजरत के नाम से चलाई एक्सप्रेस ट्रेन
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https://youtu.be/brUIhLg0lkQ?si=-isulYlQNVpb6hc8
फाजिल-ए-बरेलवी इमाम अहमद रज़ा खां के नाम से भारत सरकार ने बरेली वाया अजमेर से भुज के लिए ट्रेन चलाई थी। इसका नाम “आला हजरत एक्सप्रेस” रखा गया, जो उनके योगदान की याद दिलाती है।
आलिम ही नहीं, बल्कि एक तहज़ीबी रहनुमा

आला हजरत सिर्फ़ एक आलिम नहीं, बल्कि एक तहज़ीबी रहनुमा थे।उन्होंने मुसलमानों को इल्म, मोहब्बत और अदब का पैग़ाम दिया। उनका नाम, उनकी किताबें और उनकी तालीम आज भी रोशनी का स्रोत हैं। आला हजरत का जन्म 14 जून, 1856 को बरेली में हुआ। आपके वालिद मौलाना नकी अली खान और दादा मौलाना रज़ा अली खान दोनों ही बड़े आलिम-ए-दीन थे
बचपन का नाम “मुहम्मद”
आला हजरत के बचपन का नाम “मुहम्मद” था, लेकिन दादा ने नाम रखा अहमद रज़ा, जो बाद में “आला हजरत” के ख़िताब से मशहूर हुए। आप हज़रत सैयद शाह आले रसूल मारहरावी से मुरीद और खलीफ़ा थे। मारहरा शरीफ़ की ख़ानकाह -ए-बरकातिया से आपको खिलाफ़त हासिल हुई।
1000 से अधिक विषयों पर लिखीं किताब
आला हजरत एक आलिम, मुफस्सिर, मुहद्दिस, फक़ीह और सूफ़ी थे। उन्होंने फ़िक़्ह-ए-हनाफ़ी पर गहरी पकड़ रखकर हज़ारों फतवे जारी किए। आपने एक हजार से अधिक (तस्नीफ़ात विषयों) किताब लिखीं। इसमें “फतावा रज़विया” सबसे अहम है।
