मुहम्मद साजिद
लखनऊ में उठी आवाज़ अब बिहार के सियासी गलियारों में गूंज रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ स्थित जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका सवाल सीधा है,“जो पार्टी जेपी जैसे जननायक की स्मृति को ही मिटा दे, तो वह बिहार की जनता से लोकतंत्र के नाम पर वोट कैसे मांग सकती है?”। इस सवाल ने ना सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि बिहार की राजनीतिक धड़कनों को तेज़ कर दिया है। क्योंकि, जेपी की ज़मीन बिहार है। इसमें सबसे अधिक परेशानी बिहार के सीएम नीतीश कुमार को होने की उम्मीद है?। क्योंकि, नीतीश कुमार कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के सिंबल जयप्रकाश नारायण ही हैं। जेपी ही पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के हैं। देश भर के सोशलिस्ट नेता और दल जेपी को आदर्श मानते हैं। ऐसे में नीतीश कुमार को अपनी विचारधारा बचाने और भाजपा की विचारधारा को अपनाने से सियासी नुकसान होने की उम्मीद है ?। जिसके चलते सीएम नीतीश कुमार सियासी धर्म सकंट में फंस गए हैं। जेपी की स्मृति वहां जनभावना से जुड़ी हुई है, और अब यही मुद्दा विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा नैरेटिव बनता दिख रहा है।
JPNIC विवाद: सिर्फ इमारत नहीं, विचारधारा का प्रश्न
लखनऊ का जेपीएनआईसी समाजवादी सरकार के कार्यकाल में लोकतांत्रिक मूल्यों और जनआंदोलनों की स्मृति को संजोने के लिए बनाया गया था। सपा प्रमुख अखिलेश यादव का दावा है कि भाजपा ने राजनीतिक विद्वेष में इस वैचारिक केंद्र को जानबूझकर ठप कर दिया। उद्घाटन के समय जॉर्ज फर्नांडिस और मोहन सिंह जैसे दिग्गज नेताओं का समर्थन इस परियोजना को वैचारिक बल देता था। सवाल उठता है कि यदि एक नेता ने देश को इमरजेंसी से निकालने में अहम भूमिका निभाई थी, तो क्या उसकी स्मृति के साथ इस तरह का व्यवहार केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, या विचारधारा पर हमला?
बिहार चुनाव 2025 और जेपी फैक्टर
जयप्रकाश नारायण का नाम बिहार में केवल एक ऐतिहासिक किरदार नहीं, बल्कि आज भी जीवंत प्रतीक है। ‘संपूर्ण क्रांति’, जनता आंदोलन और सत्ता के अहंकार के खिलाफ एक जनजागरण का नाम। ऐसे में JPNIC को नजरअंदाज करना या खत्म कर देना विपक्ष के लिए एक सशक्त चुनावी मुद्दा बन सकता है। यह केवल JPNIC के अस्तित्व की बात नहीं है। यह उस वैचारिक धरोहर का सवाल है। जिसकी वजह से आज भाजपा सत्ता में आई थी। जेपी आंदोलन के वारिस होने के नाते, अगर वही पार्टी उनकी स्मृति को सहेज नहीं पा रही, तो बिहार में यह नैतिक सवाल बन सकता है।”जेपी को भुलाने वाले, बिहार को क्या याद रखेंगे?”
सियासत बनाम सिद्धांत: क्या है असली लड़ाई ?
यह विवाद किसी बिल्डिंग, बजट या प्रशासनिक निर्णय से कहीं आगे निकल चुका है। यह इस बात की लड़ाई है कि लोकतंत्र की ऐतिहासिक विरासत को कौन सम्मान देता है और कौन उसे मिटाने की कोशिश करता है। जेपी, एक विचार हैं, और विचार मिटाए नहीं जा सकते। यदि JPNIC पर राजनीतिक चुप्पी रही, तो यह सिर्फ एक परियोजना की असफलता नहीं, बल्कि वैचारिक आत्मसमर्पण भी माना जाएगा। बिहार के मतदाता इस अंतर को समझते हैं।
