भगत सिंह के न्यायायिक सलाहकार ने इंग्लैंड से पढ़ाई पूरी कर गोरों के खिलाफ फूंका बिगुल, मुल्क की आजादी के बाद बने पहले अमेरिकी राजदूत
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में राजनीतिक, कानूनी और राजनयिक स्तर पर निभाई भूमिका, चेहरे से हमेशा खामोश लेकिन निर्णायक योद्धा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अनेक महानायकों के संघर्ष और बलिदान की कहानी है, लेकिन कुछ नाम ऐसे भी हैं। जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर क्रांति को वैचारिक, कानूनी और कूटनीतिक मजबूती दी। बैरिस्टर असफ अली इन्हीं नायकों में एक हैं। 11 मई 1888 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के श्योहारा में जन्म लेने वाले असफ अली की आज यौम-ए- पैदाइश है। उन्होंने इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त कर कानूनी पेशे में कदम रखा, लेकिन अंग्रेज़ों की नीतियों और अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने में देर नहीं की। असफ अली न केवल भारतीय क्रांतिकारियों के लिए कानूनी ढाल बने, बल्कि उन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के मुकदमों में जिस साहस, तर्कशक्ति और प्रतिबद्धता से पैरवी की। वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। सेंट्रल असेंबली बम कांड के मुकदमे में उनकी भूमिका ने यह साबित कर दिया कि कानून भी स्वतंत्रता संग्राम का एक अहम मोर्चा था, और असफ अली उस मोर्चे के अग्रिम सेनानी थे। राजनीतिक दृष्टि से भी असफ अली ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, अंतरिम सरकार में मंत्री, और आज़ादी के बाद अमेरिका में भारत के पहले राजदूत के रूप में उनकी नियुक्ति यह सब उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और देशभक्ति का प्रमाण है। ओडिशा के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल भी यह दर्शाता है कि स्वतंत्र भारत को गढ़ने में उनका योगदान केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था।
आजादी के आंदोलन में पत्नी की भी अहम भूमिका

व्यक्तिगत जीवन में भी असफ अली का रिश्ता एक प्रेरक उदाहरण है। अरुणा गांगुली से विवाह और फिर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष। यह साझेदारी भारतीय समाज के सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक परिवर्तन की एक मिसाल बनी। आज जब हम स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र, न्याय और कूटनीति की बात करते हैं, तो हमें ऐसे नायकों को याद रखना चाहिए। जिन्होंने नींव रखने का काम किया। अफसोस इस बात का है कि असफ अली जैसे व्यक्तित्वों को उतनी प्रमुखता नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। इतिहास में उनके योगदान को व्यापक रूप से सामने लाना, सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा का स्रोत भी होगा। बिजनौर का यह सपूत केवल एक बैरिस्टर नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई का मौन योद्धा था। जिसने तर्क से, विचार से, और कूटनीति से इस राष्ट्र की तक़दीर बदली।
खिलाफत और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका

असफ अली का जीवन राष्ट्रभक्ति और न्याय के लिए समर्पित रहा। 1914 में इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और खिलाफत आंदोलन से जुड़कर असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधी जी द्वारा शुरू किए गए आंदोलनों में भाग लेकर ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों का विरोध किया। भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में असफ अली की भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा। 8 अप्रैल 1929 को जब सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका, तो उन्होंने नारे लगाते हुए खुद को गिरफ़्तार करवा दिया। इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने भले ही अपनी पैरवी खुद करने की मांग की थी, लेकिन अदालत में दलीलों और कानूनी प्रक्रिया के लिए बैरिस्टर असफ अली को न्यायिक सलाहकार के रूप में चुना गया। असफ अली ने बटुकेश्वर दत्त की अदालत में जमकर पैरवी की और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक बार तर्क पेश किए। वह नियमित रूप से जेल में जाकर क्रांतिकारियों से मिलते थे और मुकदमे की रणनीति बनाते थे। यह मुकदमा भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक बना, और इसमें असफ अली की भूमिका निर्णायक रही।
राजनीतिक सफर और आजादी के बाद की भूमिका
असफ अली ने 1935 में केंद्रीय विधानसभा का चुनाव कांग्रेस की ओर से लड़ा और जीत हासिल की। वह भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भी सक्रिय रहे और कई बार जेल गए। 1946 में जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो उन्हें रेलवे और परिवहन विभाग का प्रभारी मंत्री बनाया गया। 1947 से 1949 तक असफ अली को अमेरिका में भारत का पहला राजदूत नियुक्त किया गया, जो उनके राजनयिक कौशल और देशभक्ति का प्रमाण था। इसके बाद उन्होंने ओडिशा के राज्यपाल के रूप में भी सेवा दी। 1928 में असफ अली ने एक हिंदू ब्राह्मण युवती अरुणा गांगुली से विवाह किया, जो आगे चलकर अरुणा आसफ अली के नाम से जानी गईं और भारत छोड़ो आंदोलन की मशहूर नेता बनीं। स्वतंत्रता संग्राम में यह जोड़ा प्रेरणादायी रहा।
स्विट्जरलैंड के बर्न में ली अंतिम सांस
1 अप्रैल 1953 को जब असफ अली स्विट्जरलैंड के बर्न में भारत के राजदूत के रूप में कार्यरत थे। उसी दौरान उनका निधन हो गया। भारत सरकार ने 1989 में उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। उनकी पत्नी अरुणा आसफ अली को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इतिहासकार हेमंत कुमार और जेएनयू के प्रोफेसर डॉ. चमन लाल ने भी अपनी पुस्तकों में असफ अली को भगत सिंह का न्यायिक परामर्शदाता बताया है। वरिष्ठ इतिहासकार एजी नूरानी की पुस्तक The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice में भी असफ अली की भूमिका का विशद वर्णन मिलता है।
