अपने शब्दों, विचारों और जज्बे से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले मौलाना ने 1921 में की थी सबसे पहले ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग
उनका लिखा प्रसिद्ध शेर “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है…”आज भी ग़ज़ल प्रेमियों के दिलों को छूता..
मुहम्मद साजिद
मौलाना हसरत मोहानी एक ऐसा नाम, जो न केवल उर्दू शायरी की बुलंदियों पर कायम रहा, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे तेज और बेखौफ आवाजों में से एक भी रहा। जब भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य की काली छाया छाई हुई थी, तब हसरत मोहानी जैसे लोग मशाल बनकर उठे। उन्होंने अपने शब्दों से, अपने विचारों से और अपने जज्बे से अंग्रेजी हुकूमत की नींव को हिलाकर रख दिया। हसरत मोहानी का नाम आज भी कानपुर, मुंब्रा, बिठूर, कराची और हैदराबाद (सिंध) की गलियों और संस्थानों में जीवित है। उनकी स्मृति में कई पुस्तकालय, सड़कें और संग्रहालय बने हैं, जो हमें यह याद दिलाते हैं कि आज़ादी की लड़ाई केवल तलवारों से नहीं, विचारों से भी लड़ी गई थी। मौलाना का असली नाम सैयद फ़जलुल हसन था। उनकी पैदाइश यूपी के उन्नाव जिले के मोहान गांव में 1 जनवरी 1875 को हुआ। उनका इंतकाल 13 मई, 1951 में हुआ था। आज मौलाना हसरत मोहानी की आज यानी 13 मई को वरसी (पुण्यतिथि) है।
‘इंकलाब जिंदाबाद’ की गूंज: क्रांति का बिगुल

आज जिसे हम हर क्रांतिकारी भाषण या आंदोलन में सुनते हैं, “इंकलाब जिंदाबाद”, वह नारा सबसे पहले मौलाना हसरत मोहानी ने ही 1921 में दिया था। यह नारा केवल एक उद्घोष नहीं था। यह उस समय के दबे-कुचले लोगों के दिल की आवाज बन गया था। इसके बाद में भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों ने इसी नारे को देश की क्रांति का प्रतीक बना दिया।
‘पूर्ण स्वराज’ का सबसे पहला बिगुल

साल 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में जब कांग्रेस केवल डोमिनियन स्टेटस (ब्रिटिश शासन के अधीन स्वतंत्रता) की बात कर रही थी। उस समय मौलाना हसरत मोहानी ने सबसे पहले “पूर्ण स्वराज” की माँग रखी। यह उस युग में बहुत साहसिक और दूरदर्शी कदम था, जब बहुत कम लोग ब्रिटिश राज से पूरी आज़ादी की बात करने की हिम्मत रखते थे।
उनकी पत्रकारिता बेबाकी की मिसाल
मौलाना हसरत मोहानी की पत्रकारिता उतनी ही बेबाक और धारदार थी, जितनी उनकी शायरी। उन्होंने उर्दू पत्रिका ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ की स्थापना की, जो ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों की कटु आलोचना करती थी। इस साहसिक लेखनी के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा, लेकिन उनकी कलम कभी नहीं रुकी।
शायर जो दिलों में बस गया
मौलाना हसरत मोहानी की शायरी में इश्क, दर्द, और रहस्य की मिठास थी। उनका लिखा प्रसिद्ध शेर “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है…”आज भी ग़ज़ल प्रेमियों के दिलों को छूता है। इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह और गुलाम अली जैसे महान गायकों ने अपनी आवाज दी, और फिल्म निकाह में immortal बना दिया।
एक राष्ट्रवादी मुसलमान और कृष्ण भक्त
धार्मिक रूप से मौलाना एक आस्थावान मुसलमान थे, लेकिन वह उतने ही कट्टर राष्ट्रवादी भी थे। वे हर साल कृष्ण जन्माष्टमी मनाने के लिए मथुरा जाया करते थे और भगवान कृष्ण पर शायरी भी करते थे। उनकी शख्सियत सांप्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल है। राजनीति में उनके सिद्धांतों की मिसाल पेश की जाती है।
भारत विभाजन के कट्टर विरोधी, छोड़ दी मुस्लिम लीग
वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग दोनों के सदस्य रहे, लेकिन जब 1947 में भारत के विभाजन की योजना सामने आई,तो उन्होंने मुस्लिम लीग से इस्तीफा दे दिया। वे पाकिस्तान नहीं गए, बल्कि भारत में ही रहकर मुस्लिमों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य भी बने। उन्होंने कभी सरकारी भत्ते या बंगले नहीं लिए। मस्जिदों में रहते, संसद साझा तांगे में जाते, और तीसरी श्रेणी में रेल यात्रा करते। जब उनसे पूछा गया कि वह थर्ड क्लास में क्यों चलते हैं, तो बोले, “क्योंकि चौथी क्लास होती नहीं!” यह उनके विनम्र और आदर्श जीवन की गवाही है।
