जातिवार जनगणना को बताया पीडीए की जीत, समाजवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय के संघर्ष को मिला सम्मान
सौजन्य से लोकसभा टीवी
लखनऊ : समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव (नेताजी) ने दशकों तक समाज के वंचित, शोषित और पिछड़े तबकों को उनका हक दिलाने की मांग की थी। उन्होंने कई बार जातिवार जनगणना का मुद्दा संसद में उठाया था। मगर, अब समाजवादियों की लड़ाई एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। यह मुद्दा देश की सामाजिक न्याय की लड़ाई में ऐतिहासिक साबित हो रहा है।
नेता जी की दूरदर्शिता और साहसिक नेतृत्व
उन्होंने कहा कि नेता जी ने हमेशा यह दृढ़ता से कहा कि जाति की गणना न कराना दरअसल सामाजिक न्याय की अनदेखी करना है। वे जानते थे कि जब तक संख्या के आधार पर समाज की स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं होगा, तब तक नीतियां केवल ताकतवर वर्ग के पक्ष में झुकती रहेंगी। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक इस मांग को पुरज़ोर तरीक़े से उठाया और सरकारों को जगाने और झकझोरने का काम किया। उनका यह विश्वास था कि शोषण, उत्पीड़न और वंचना से मुक्त भारत तभी संभव है जब सत्ता और संसाधनों में हर तबके की समान भागीदारी सुनिश्चित हो। वह यह मानते थे कि जो लोग सदियों से सत्ता के केंद्र में हैं, वे बिना दबाव और संघर्ष के हाशिए पर खड़े लोगों को बराबरी में हिस्सा नहीं देंगे।
एक लंबा संघर्ष, अब जाकर दिखा परिणाम
जातिवार जनगणना की यह मांग केवल एक आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की नींव है। इस मांग के पीछे उन सभी समाजवादी नेताओं का संघर्ष और बलिदान है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस विचारधारा को मजबूत करने में लगा दिया। उनकी सोच थी “गिनती होगी तभी गिनती होगी”, यानी जब तक वंचितों की वास्तविक संख्या दर्ज नहीं होगी, तब तक उन्हें उनका वास्तविक अधिकार नहीं मिल पाएगा।
सामाजिक न्याय के विचारकों की ऐतिहासिक जीत
सपा प्रमुख ने कहा आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तीकरण और लोकतांत्रिक हिस्सेदारी की दिशा में एक निर्णायक कदम है। यह उन सामाजिक न्याय के विचारकों की जीत है, जिन्होंने सौ वर्षों से चली आ रही उस मानसिकता का विरोध किया, जो जातीय पहचान और हक को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करती रही। यह उन ताकतों की करारी हार भी है जो जातीय गणना को सामाजिक विघटन का नाम देकर इसे रोकते रहे, जबकि सच्चाई यह है कि समावेशी लोकतंत्र की बुनियाद इसी पारदर्शिता और भागीदारी पर टिकी होती है। अब जब जातिवार जनगणना की दिशा में निर्णायक पहल हो चुकी है।
