नई दिल्ली : लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर लंबी बहस के बाद शुक्रवार को मतदान कराया गया। इस दौरान कुल 528 सांसदों ने वोट डाला, जिनमें 298 सांसदों ने विधेयक के समर्थन में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि, संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत, यानी 352 वोट नहीं मिल सके। इसके चलते लोकसभा अध्यक्ष ने घोषणा की कि यह विधेयक आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर पाया है और इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य विधेयकों पर भी मतदान नहीं कराया।
मतदान के बाद सरकार की ओर से कहा गया कि यह महिलाओं को अधिकार और सम्मान देने से जुड़ा एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम था, लेकिन विपक्ष ने इसमें सहयोग नहीं किया। सरकार ने अफसोस जताते हुए कहा कि यह एक बड़ा अवसर था, जिसे खो दिया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि महिलाओं को अधिकार दिलाने की दिशा में प्रयास आगे भी जारी रहेंगे। पिछले कई वर्षों में यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार का कोई संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका।
इस विधेयक पर सदन में करीब 21 घंटे तक चर्चा चली, जिसमें 130 सांसदों ने हिस्सा लिया। इनमें 56 महिला सांसद भी शामिल रहीं, जिन्होंने अपने विचार रखे। चर्चा के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि परिसीमन का विरोध करने वाले दरअसल अनुसूचित जाति और जनजाति के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के खिलाफ हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि धर्म के आधार पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं किया जाएगा और परिसीमन के बाद भी सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा।
वहीं विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि चुनावी व्यवस्था में बदलाव का प्रयास था। विपक्ष का आरोप है कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ था, जिसे मिलकर रोका गया।
विधेयक में प्रस्ताव था कि 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक की जा सकती है। इसके अलावा 2029 के आम चुनावों से पहले महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की योजना भी शामिल थी। साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए सीटें बढ़ाने का प्रावधान किया गया था, ताकि आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
