लेखक
मुहम्मद साजिद
जंग -ए- आजादी में तात्या टोपे की भी अहम भूमिका है। क्रांतिकारी तात्या टोपे सिर्फ़ एक योद्धा नहीं, बल्कि कुर्बानी और जज़्बे का नाम हैं। उनकी शहादत हमें यह याद दिलाती है कि आज़ादी कभी भी आसानी से हासिल नहीं होती। इसके लिए जान की बाज़ी लगानी पड़ती है। हम सबको उनके उस जज़्बे से सीख लेनी चाहिए, जो “झुके नहीं, डटकर लड़े, तात्या टोपे, जिनका असली नाम रामचंद्र पांडुरंग टोपे था। वह पेशवा दरबार से जुड़े हुए थे। उनका बचपन बिठूर में बीता और वहीं उनकी दोस्ती नाना साहब पेशवा से हुई। यही दोस्ती आगे चलकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक इंक़लाबी रिश्ता बन गई।
1857 की क्रांति को दी नई दिशा
तात्या टोपे ने 1857 की क्रांति को नई दिशा दी थी। जहाँ अंग्रेज़ खुले मैदान में लड़ाई में भारी पड़ते थे, तो वहीं तात्या ने छापामार (गुरिल्ला) युद्ध की नीति अपनाई। तेज़ी से एक जगह से दूसरी जगह हमला करना, अंग्रेज़ों की सप्लाई लाइन काटना, उनके संचार तंत्र को तबाह करना, ये सब उनके हुनर का हिस्सा था। इतिहासकार पंडित सुंदरलाल ने अपनी किताब “भारत में अंग्रेज़ी राज” में लिखा है कि तात्या अंग्रेज़ी सेनाओं को चकमा देने में उस्ताद थे। उनकी एक रणनीति से हज़ारों अंग्रेज़ सिपाही महीनों तक परेशान रहते।
झांसी की रानी से किया गठजोड़
तात्या टोपे ने रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया, और ग्वालियर पर कब्ज़ा किया। हालाँकि, ये विजय बहुत लंबे वक़्त तक नहीं रह सकी, लेकिन इसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींद उड़ा दी। उनकी गिनती सिर्फ़ सेनापति के तौर पर ही नहीं, बल्कि सलाहकार, रणनीतिकार और दोस्त के रूप में भी हुई। नाना साहब के साथ उनकी जोड़ी ने कानपुर की लड़ाई में अंग्रेज़ों को बार-बार शिकस्त दी।
अपनों की ग़द्दारी से चढ़ गए फांसी पर
जैसा कि अक्सर होता आया है। उसी तरह से तात्या टोपे के साथ भी हुई। आज़ादी की जंग में सबसे बड़ा दुश्मन अपना ही निकला। 1859 में उनके साथी मान सिंह ने विश्वासघात किया, और अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया। 7 अप्रैल को गिरफ़्तार हुए तात्या को अंग्रेज़ों ने महज़ 11 दिन बाद 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में फांसी पर लटका दिया। इतिहासकारों में अब भी बहस है, कुछ कहते हैं कि वे वीरगति को युद्ध में प्राप्त हुए, कुछ कहते हैं अंग्रेज़ों ने उन्हें सरेआम फांसी दी। लेकिन एक बात तय है, अंग्रेज़ उनकी मौत से भी डरते थे। लेखक पराग टोपे की किताब “ऑपरेशन रेड लोटस” में उनके बारे में विस्तार से लिखा गया है। इस किताब में साफ़ लिखा है कि तात्या की जंग सिर्फ़ बंदूक और तलवार की नहीं थी, बल्कि रणनीति और संगठन की भी थी।
