करंसी और मनी ऑर्डर को जायज़ ठहराने वाले पहले आलिम, 107 वें उर्स पर आलिम डालेंगे दीनी वो
बरेली : आला हजरत इमाम अहमद रज़ा ख़ां फ़ाज़िले बरेलवी वो शख़्सियत हैं, जिनकी इल्मी और फ़िक्री सेवाओं ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया। दरगाह-ए-आला हजरत, इस्लामिया मैदान, और जामियातुर रज़ा में 107 वां उर्स-ए-रज़वी 18 अगस्त से शुरू हो रहा है। जिसके चलते तैयारियां मुकम्मल (पूरी) करने की कवायद चल रही है। आला हजरत सिर्फ दीन के आलिम ही नहीं, बल्कि गणित, विज्ञान, खगोलशास्त्र, अर्थशास्त्र, भाषाशास्त्र समेत 55 विषयों में माहिर थे। दुनिया की लगभग 100 यूनिवर्सिटी से अधिक में आपके जीवन और कारनामों पर तहकीक (रिसर्च) हो चुकी है, तो वहीं चल रही है। दुनिया के बड़े-बड़े दानिशवर ये देखकर हैरान हैं कि एक इंसान इतने विषयों में कैसे माहिर हो सकता है।
कुरआन के 30 पारे साढ़े सात घंटे में याद
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किताब अल-मआरिफ़-उल-शरीफ़ा और अन्य तस्लीमशुदा हवाले बताते हैं कि आला हजरत ने सिर्फ 7.5 घंटे में कुरआन-ए-करीम के 30 पारे ज़बानी याद कर लिए थे। उनका कहना था “कोई भी शख़्स मुझको कोई किताब एक बार पढ़कर सुना दे और फिर मैं उसे हूबहू सुना दूँगा।”
करंसी नोटों को ठहराया जायज़
जब दुनिया में सिक्कों की कमी हुई, और करंसी नोटों का रिवाज बढ़ा, तब कई बड़े आलिमों ने इसे हराम करार दिया। आला हजरत ने शरीयत की रोशनी में रिसर्च करके करंसी नोटों को जायज़ बताया। यह फ़तवा किताब किफायतुल-मुस्तफ्ती में दर्ज है।
मनी ऑर्डर को भी बताया जायज़
उस ज़माने में मनी ऑर्डर को सूद बताकर हराम कह दिया गया था। आला हजरत ने शरीयत के अहकाम, और आर्थिक तर्क के साथ इसे जायज़ ठहराया, और चार्ज को मजदूरी की श्रेणी में रखा। उनका यह फैसला पूरी दुनिया में तस्लीम (मंजूर) किया गया।
फ़तवे, किताबें और रिसर्च पेपर्स पढ़ाई और शोध का विषय
आला हजरत के फ़तवे, किताबें और रिसर्च पेपर्स विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और शोध का विषय हैं। उनके इल्मी कारनामे यह साबित करते हैं कि इस्लाम सिर्फ इबादत का मज़हब नहीं, बल्कि इल्म, साइंस और इंसानियत का भी पैग़ाम देता है।
