कुल शरीफ़ के साथ 107वां उर्स -ए-रज़वी सम्पन्न, इस्लामिया मैदान, मदरसा जमीयतुरज़ा, और दरगाह जायरीन की भीड़, सूफ़ी सुन्नी तालीमात से ही दुनिया में अमन
बरेली : दरगाह-ए-आला हज़रत में आज लाखों अकीदतमंदों की मौजूदगी में 107वां उर्स-ए-रज़वी का समापन कुल शरीफ़ की रस्म के साथ हुआ। ठीक 2 बजकर 38 मिनट पर फातिहा, और दुआ के साथ तीन रोज़ा उर्स सम्पन्न हुआ। इस मौके पर सज्जादानशीन मुफ़्ती अहसन मियां ने मुल्क-ए-हिंद समेत पूरी दुनिया में अमन, सुकून और खुशहाली की दुआ की। कार्यक्रम का आगाज़ दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रज़ा खाँ (सुब्हानी मियां) की सरपरस्ती में हुआ। जिसकी सदारत मुफ़्ती अहसन रज़ा क़ादरी (अहसन मियां) ने की और सय्यद आसिफ मियां निगरानी कर रहे थे। मदरसा जमीयतुरज़ा में काजी-ए-हिन्दुस्तान मुफ्ती असजद रज़ा खा ने बदलते हालात में मुसलमानों से बदलने की बात कही।
सूफ़ी उलमा ने दिया पैग़ाम:
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मुफ़्ती सलीम नूरी बरेलवी ने कहा
सूफ़ी सुन्नी विचारधारा ही दुनिया में अमन कायम कर सकती है। भारत एक खूबसूरत गुलदस्ता है। जिसके फूल हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब हैं। आला हज़रत ने अंग्रेज़ों से नफ़रत और मुल्क से वफ़ादारी का पैग़ाम दिया।
आला हज़रत का मिशन सिर्फ़ बरेलवी नहीं बल्कि पैग़म्बर -ए-इस्लाम : मुफ्ती सलमान
मुफ़्ती सलमान अजहरी ने कहा आला हज़रत का मिशन सिर्फ़ बरेलवी नहीं बल्कि पैग़म्बर -ए- इस्लाम की तालीमात है। हमें इस मिशन को दुनिया तक पहुंचाना होगा।”मुफ़्ती इमरान हनफ़ी ने कहा “मसलक-ए-आला हज़रत ही वफ़ा-ए-रसूल का रास्ता है, यही रास्ता हमारे नबी और अहले-बैत का रास्ता है।”मुफ़्ती तौहीद संभली ने बेटियों की तालीम और परवरिश पर जोर दिया और अमीरों से स्कूल -कॉलेज खोलने की अपील की। मुफ़्ती अख़्तर हुसैन ने कहा कि “आला हज़रत के लाखों फतवे कुरान-हदीस की रोशनी में हैं, आज तक किसी एक फतवे में भी रद्दोबदल की ज़रूरत पेश नहीं आई।
पैग़म्बर-ए-इस्लाम का 1500 साला जश्न-ए-विलादत मनेगा
कारी यूसुफ़ रज़ा संभली ने बताया कि इस साल पूरी दुनिया में पैग़म्बर -ए-इस्लाम का 1500 साला जश्न-ए-विलादत मनाया जाएगा। महफ़िल में नात-ओ-मनक़बत का नज़राना पेश किया गया। सुल्तान रज़ा खा, अल्हाज शोएब रज़ा खाँ, सय्यद सैफी मियां, कारी रज़ा-ए-रसूल, महशर बरेलवी, ने कलाम पेश किया। मारहरा शरीफ़ के सज्जादानशीन नज़ीब मियां,तौसीफ़ रज़ा खाँ,मुफ़्ती अर्सलान रज़ा,और दूसरे उलमा ने कहा “बरेलवी कोई फ़िरक़ा नहीं बल्कि नबी-ए-करीम का मिशन है।”मुफ़्ती नदीम अख़्तर (मॉरीशस) ने कहा “जहाँ फतावा आलमग़ीरी 500 उलेमा ने मिलकर 2 जिल्दें लिखी, वहीं आला हज़रत अकेले ने 12 जिल्दों में फतावा-ए-रज़विया लिखा, जो आज भी दुनियाभर में शरीअत के मसाइल हल करता है।”
इन्होंने संभाली व्यवस्था
उर्स की तमाम व्यवस्था राशिद अली खान, मौलाना ज़ाहिद रज़ा, मौलाना बशीर उल क़ादरी, शाहिद खाँ, हाजी जावेद खाँ, नासिर कुरैशी, हाफिज इकराम, डॉक्टर मेहंदी हसन, कौशर अली, शमीम अहमद, अजमल नूरी समेत सैकड़ों जिम्मेदारों ने संभाली।
