निजी संपत्ति पर नमाज की अनुमति, मगर सार्वजनिक व्यवस्था सर्वोपरि
बरेली/प्रयागराज/रांची : न्यायपालिका से जुड़े एक अहम फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता। बरेली देहात के विशारतगंज निवासी तारिक खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता राजेश गौतम ने “The Justice Hindi” को बताया कि याचिका पर सुनवाई करने वाली एक खंडपीठ बदल चुकीं है। मगर, नई खंडपीठ ने निजी संपत्ति पर नमाज की छूट दी है, लेकिन बड़ी संख्या में भीड़ एकत्र न होने का फैसला सुनाया है।
DM-SSP को किया तलब, साक्ष्यों पर लिया सख्त रुख

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बरेली के जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी को व्यक्तिगत रूप से तलब किया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि याचिकाकर्ता की निजी संपत्ति पर रोजाना 50 से अधिक लोग नमाज के लिए जुट रहे थे, जिससे इलाके की शांति प्रभावित होने की आशंका थी।
कोर्ट का स्पष्ट संदेश: इबादत करें, मगर भीड़ नहीं

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि व्यक्ति अपनी निजी संपत्ति पर नमाज पढ़ सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुटाकर ऐसा करना और उससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होना स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने प्रशासन को जरूरत पड़ने पर सख्त कार्रवाई की छूट भी दी।
शर्तों के साथ राहत, चालान और नोटिस रद्द

याचिकाकर्ता की ओर से आश्वासन दिया गया कि भविष्य में भीड़ एकत्र नहीं होगी। इस पर कोर्ट ने 16 जनवरी को जारी चालान वापस लेने और अवमानना नोटिस रद्द करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही हसीन खान को दी गई सुरक्षा भी वापस लेने को कहा गया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का भी अहम नजरिया
इसी मुद्दे पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने घर में प्रार्थना सभा आयोजित कर सकता है और इसके लिए पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं है, बशर्ते इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित न हो।
दोनों फैसलों से साफ संदेश
दोनों हाईकोर्ट के फैसलों से यह स्पष्ट हो गया है कि संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार कानून और शांति व्यवस्था के दायरे में ही लागू होता है।
