गांधी-सुभाष भी करते थे भरोसा, जंगे-ए-आजादी के बेबाक सिपाही से कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत
लेखक
मुहम्मद साजिद
जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखा जाता है, तो उसमें अक्सर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के बड़े नामों की चर्चा होती है। लेकिन बिहार के एक छोटे से गांव शाहाबाद से उठने वाले एक मजदूर नेता ने न सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत को ललकारा, बल्कि श्रमिक अधिकारों को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। उस महान शख्सियत का नाम था, प्रोफेसर अब्दुल बारी। वर्ष 1892 में बिहार के भोजपुर ज़िले के शाहाबाद गांव में जन्मे अब्दुल बारी ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद पटना विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता मोहम्मद कुर्बान अली धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से सजग व्यक्ति थे। उनका प्रभाव बारी साहब पर भी पड़ा।
गांधी से मुलाकात के बाद पकड़ी आज़ादी की राह
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1917 में महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद प्रोफेसर बारी ने अपना जीवन भारत की आज़ादी, और समाज सुधार को समर्पित कर दिया। 1920-22 के खिलाफ़त और असहयोग आंदोलन के दौरान वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह जैसे नेताओं के साथ मिलकर बिहार में जनजागरण के प्रतीक बन गए।
बिहार विद्यापीठ, और शिक्षा से क्रांति
1921 में जब गांधीजी ने बिहार विद्यापीठ की स्थापना की, तो अब्दुल बारी उसमें बतौर प्रोफेसर शामिल हुए, लेकिन यह कोई साधारण अध्यापन नहीं था। यह छात्रों को आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और देशभक्त नागरिक बनाने की क्रांति थी।
मज़दूर आंदोलन के पितामह
1930 में भागलपुर सत्याग्रह और फिर 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान अब्दुल बारी ने मजदूरों की ताकत को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ा। वे उस समय के शायद एकमात्र ऐसे नेता थे, जो शोषित वर्ग और राष्ट्रवाद को साथ लेकर चल रहे थे। जब सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन की ज़िम्मेदारी सौंपी, तो उन्होंने उड़ीसा, बंगाल और बिहार के मज़दूरों को संगठित कर देशव्यापी प्रभाव डाला।
शहादत और गांधी का दुख
28 मार्च 1947, जब देश आज़ादी के करीब था, तब फतुहा के पास अब्दुल बारी की हत्या कर दी गई। उनकी मौत कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि मज़दूर आंदोलन और साम्प्रदायिक सौहार्द की आवाज़ को कुचलने की कोशिश थी। उनकी नमाज़े जनाज़ा में महात्मा गांधी स्वयं शामिल हुए, जो इस बात का प्रमाण है कि अब्दुल बारी उस दौर के कितने बड़े नेता थे।
मजदूरों के हक को लड़ते थे सड़क पर
इस नायक को इतिहास की किताबों ने भुला दिया, लेकिन जिसने मज़दूरों की आवाज़ को आज़ादी की लड़ाई से जोड़ दिया।” उसका नाम प्रोफेसर अब्दुल बारी था। वह मजदूरों के हक की लड़ाई को सड़क पर उतर आते थे। क्या जिन मूल्यों के लिए अब्दुल बारी लड़े, वे आज भी ज़िंदा हैं। उनकी वजह से मजदूर वर्ग आज भी सुरक्षित, संगठित और सम्मानित है। एसएन सिंहा की किताब ” Freedom Struggle in Bihar”,मुशीरुल हसन की किताब “Muslims and Indian Nationalism”, “Indian Labour Movement Archives, Jamsetpur Labour Association Records के हवाले से उनकी सादगी, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मजदूरों को एकत्र आंदोलन करने के बारे में विस्तार से बताया गया है।
