नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को न्यायपालिका के भीतर कार्यप्रणाली और आचरण को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से गंभीर चिंता जताई है। हालांकि कोर्ट ने सीधे तौर पर भ्रष्टाचार शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन रिटायरमेंट से ठीक पहले कुछ जजों द्वारा तेजी से फैसले सुनाने की प्रवृत्ति को “दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाल के समय में यह देखा जा रहा है कि कुछ न्यायिक अधिकारी रिटायरमेंट के दिनों में असामान्य रूप से अधिक आदेश पारित कर रहे हैं, जो न्यायिक गरिमा और संतुलन के लिहाज से उचित नहीं है।
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में जज ने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें रिटायरमेंट से महज 10 दिन पहले निलंबित कर दिया गया था। आरोप था कि जज ने अपने सेवा काल के अंतिम दिनों में कुछ संदिग्ध और विवादित आदेश पारित किए थे।
सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि कुछ जज रिटायरमेंट से ठीक पहले ऐसे आदेश पारित करते हैं, जैसे क्रिकेट मैच के आखिरी ओवर में छक्के लगाए जा रहे हों। कोर्ट ने कहा कि यह प्रवृत्ति न्यायपालिका की साख के लिए ठीक नहीं है और इससे गलत संदेश जाता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि न्यायिक जिम्मेदारी केवल फैसले सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें निष्पक्षता, संतुलन और ईमानदारी भी शामिल है।
याचिकाकर्ता जज की ओर से सीनियर एडवोकेट विपिन सांघी ने दलील दी कि उनका करियर पूरी तरह बेदाग रहा है। उन्होंने बताया कि जज को अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों में लगातार उच्च रेटिंग मिलती रही है। सांघी ने सवाल उठाया कि जिन आदेशों को संदिग्ध बताया जा रहा है, उन्हें हाईकोर्ट में अपील के जरिए सुधारा जा सकता था। इसके बजाय सीधे निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई क्यों की गई।
उन्होंने यह भी कहा कि जज का रिटायरमेंट 30 नवंबर 2025 को होना था, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा रिटायरमेंट की उम्र 62 वर्ष किए जाने के बाद अब वह 30 नवंबर 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। इस पर CJI ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब जज ने तेजी से आदेश पारित किए, तब उन्हें रिटायरमेंट की उम्र बढ़ने की जानकारी नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है और इस पर ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई आदेश स्पष्ट रूप से बेईमानी या गलत मंशा से दिया गया हो, तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है। बेंच ने सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता ने निलंबन को चुनौती देने के लिए पहले हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया। इस पर जवाब दिया गया कि निलंबन का फैसला फुल कोर्ट का था, इसलिए निष्पक्ष सुनवाई के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट आना उचित समझा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता पहले हाईकोर्ट में प्रतिनिधित्व दें। कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय करे। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह जानकारी पाने के लिए आरटीआई का सहारा ले।
