सुप्रीम कोर्ट की केंद्र सरकार को फटकार, मनमाने हवाई किरायों पर सख्त रुख
नई दिल्ली। देश में हवाई किरायों और अतिरिक्त शुल्कों में हो रही मनमानी बढ़ोतरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि बार-बार समय दिए जाने के बावजूद सरकार की ओर से अब तक हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, जो कि गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें मांग की गई है कि विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और यात्रियों के हितों की सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र और मजबूत नियामक संस्था बनाई जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान में एयरलाइंस कंपनियां बिना किसी ठोस नियंत्रण के मनमाने तरीके से किराए और शुल्क बढ़ा रही हैं, जिससे आम यात्रियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा कि आखिर अब तक हलफनामा क्यों दाखिल नहीं किया गया और इसके लिए और समय की मांग क्यों की जा रही है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि इस विषय पर मंत्रालय में अभी विचार-विमर्श जारी है और कुछ नियमों पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम एशिया में मौजूदा परिस्थितियों का भी हवाला दिया। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कहा कि “विचार चल रहा है” जैसी बातें रिकॉर्ड का हिस्सा होनी चाहिए, इसलिए हलफनामा तुरंत दाखिल किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले भी तीन बार समय दिया जा चुका है, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब मामला यात्रियों के हितों से जुड़ा है तो इसे लगातार टाला क्यों जा रहा है। केंद्र सरकार ने तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा, लेकिन कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि हलफनामा अगले सप्ताह तक हर हाल में दाखिल किया जाए। इससे पहले 19 जनवरी की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किरायों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी पर चिंता जताई थी और इसे यात्रियों के साथ “शोषण” जैसा बताया था। त्योहारों और पीक सीजन में किराए कई गुना बढ़ने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार और विमानन महानिदेशालय से जवाब मांगा था।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि निजी एयरलाइंस कंपनियों ने बिना उचित कारण के चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है, जिससे यात्रियों को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। इसके अलावा एक ही बैग की अनुमति और कई सेवाओं पर अतिरिक्त शुल्क वसूलने को भी मनमानी बताया गया है। याचिका में यह स्पष्ट कहा गया है कि देश में अभी तक ऐसा कोई प्रभावी नियामक तंत्र मौजूद नहीं है, जो हवाई किरायों और अतिरिक्त शुल्कों पर नियंत्रण रख सके। इसी कारण एयरलाइंस कंपनियां अपनी मर्जी से कीमतें तय कर रही हैं।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख यह संकेत देता है कि अब विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और नियंत्रण को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ने वाला है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि केंद्र सरकार अदालत के अगले आदेश तक क्या जवाब दाखिल करती है और क्या यात्रियों को महंगे हवाई किरायों से राहत मिल पाएगी या नहीं।
