मुहम्मद साजिद
1856 का साल- भारतीय इतिहास में अवध की नवाबी के अंत का वर्ष है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने “कुशासन” का बहाना बनाकर नवाब वाजिद अली शाह का राज छीन लिया। लखनऊ, जो कभी तहज़ीब, संगीत, नृत्य और अदब का गहना था, उसी के नवाब को अंग्रेज़ों ने सत्ता से बेदखल कर कलकत्ता (अब कोलकाता) निर्वासित कर दिया, लेकिन वाजिद अली शाह को अब भी भरोसा था कि अगर वे महारानी विक्टोरिया के सामने अपनी बेगुनाही साबित करेंगे, तो शायद उनका राज लौट आएगा। इसी उम्मीद में उन्होंने अपनी मां मलिका -ए- किश्वर, भाई सिकंदर हशमत और युवराज मिर्जा हामिद अली के साथ कलकत्ता की राह ली, ताकि लंदन जाकर न्याय की गुहार लगा सकें।
“गवर्नर जनरल ने फरियाद नहीं सुनी…
इतिहासकार रोज़ी ल्यूवेलिन-जोन्स लिखती हैं कि वाजिद अली शाह की फरियाद गवर्नर जनरल ने ठुकरा दी। बीमार नवाब को डॉक्टरों ने समुद्री यात्रा से रोका, और उनकी जगह प्रतिनिधि मसीहुद्दीन खां को लंदन भेजा गया, लेकिन वहां भी अपमान की इंतिहा थी। महारानी विक्टोरिया ने महीनों तक मुलाकात का समय ही नहीं दिया, जब तक मौका मिला, तब तक भारत में 1857 का गदर भड़क चुका था,और वाजिद अली शाह पर अंग्रेजों ने “बागियों से सहानुभूति” का शक जता दिया। उन्हें फोर्ट विलियम (कोलकाता) में नजरबंद कर दिया गया, यानी, जिसने राज छीना, उसी से न्याय की उम्मीद करने वाले नवाब की तकदीर अब ब्रिटिश सलाखों में कैद थी।
लंदन में सुनवाई टल गई, उम्मीद टूट गई
वाजिद के प्रतिनिधि मसीहुद्दीन खां ने लंदन में अपील की,पर ब्रिटिश संसद ने कह दिया-“अब तो बागियों ने अवध पर कब्जा कर लिया है, जब फिर हमारा राज लौटेगा,तब देखेंगे।गदर थम गया, अपील फिर दायर हुई, लेकिन नतीजा वही रहा। इस बीच, कलकत्ता में नवाब के कुछ दरबारी मसीहुद्दीन के खिलाफ साजिशें रचने लगे। उन्होंने वाजिद अली शाह के कान भर दिए कि “अंग्रेज कभी छिना हुआ राज नहीं लौटाते, हुजूर! पेंशन लेकर चैन की जिंदगी बिताइए।”थके, टूटी उम्मीदों वाले वाजिद ने अंततः हार मान ली,और सालाना तीन लाख रुपये की पेंशन पर समझौता कर लिया। इस तरह “अवध की शेरो-शायरी और नज़ाकत के शहंशाह” अंग्रेज़ी दया पर जीवित रहने को मजबूर हो गए।
“मुझे मेरी जूतियां नहीं मिलीं…” नवाबियत की कहावत
अवध में आज भी एक कहावत मशहूर है,ज्यादा नवाब मत बनो! यह कहावत उस प्रसंग से जुड़ी है, जब 1857 के गदर के दौरान अंग्रेजों ने जबरन वाजिद अली शाह का महल घेर लिया। महल में अफरा-तफरी मच गई, सेवक भाग गए, बीबियां छिप गईं। अंग्रेज सिपाहियों ने पूछा, “आप क्यों नहीं भागे?”। वाजिद अली शाह ने जवाब दिया-“मुझे मेरी जूतियां नहीं मिलीं… उन्हें पहनाने वाला कोई नहीं था, तो कैसे भागता?। यह जवाब उस दौर की अवधीय तहज़ीब, ठहराव और बेबसी का प्रतीक बन गया।
संगीत, शायरी और ‘परीख़ाना’ का नवाब
इतिहासकार अमरेश मिश्रा अपनी किताब में लिखते हैं वाजिद अली शाह सिर्फ राजा नहीं, एक कलाकार भी थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘परीख़ाना’ में अपने संगीत, प्रेम और कला की दुनिया का चित्र खींचा। उनके बनाए ‘परीख़ाने’ में नृत्य और संगीत की शिक्षा दी जाती थी, जहां “परियाँ” (महिला कलाकार) और “उस्ताद” मिलकर लखनऊ की कला को नई ऊंचाइयों पर ले गए।
इसी परंपरा की जड़ में आज का “कथक” नृत्य शैली विकसित हुई।।उनके दरबार में कविता, थियेटर और संगीत के साथ धर्मनिरपेक्षता की झलक मिलती थी। उन्होंने ‘बहार-ए-इश्क़’ और ‘रहस’ जैसे नाटक लिखे,कृष्ण भक्ति पर आधारित कार्यक्रमों में स्वयं भाग लिया, उनकी चार पत्नियों ने गोपियों की भूमिका निभाई।
राजनीति में हार, संस्कृति में अमरता
अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह से उनका राज तो छीन लिया,लेकिन उनके शौक, संगीत और इंसानियत की विरासत आज भी लखनऊ की गलियों में जिंदा है। उनका मटियाबुर्ज का महल आज भी उनकी यादों से आबाद है,जहां उन्होंने अपने आखिरी दिन लिखते और गाते हुए बिताए। वाजिद अली शाह हार गए सत्ता की लड़ाई, पर जीत गए तहज़ीब, कला और अदब की जंग।
