आइसीआइसीआई बैंक के सेविंग एकाउंट को 50 हजार मिनिमम राशि
लेखक
संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
2025 की पहली तिमाही (अप्रैल -जून) में भारतीय सार्वजनिक बैंकों ने एक बार फिर अपनी मजबूती साबित की है। खासतौर पर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने अपनी नेट प्रॉफिट में 12.5% की बढ़ोतरी दर्ज की है,जो 19,160 करोड़ का यह लाभ दर्शाता है। सार्वजनिक बैंक न केवल अपनी कार्यक्षमता बेहतर कर रहे हैं, बल्कि खर्चों पर काबू पा कर देश की आर्थिक समृद्धि में योगदान दे रहे हैं।
पिछले साल से 17,035 करोड़ अधिक
नेट प्रॉफिट 19,160 करोड़ है, जो पिछले साल की तिमाही से 17,035 करोड़ अधिक है। ग्रॉस एडवांसेज में 12% की बढ़ोतरी, जो 42.54 लाख करोड़ तक पहुंच गया। डिपॉजिट्स में भी 12% की वृद्धि, कुल 54.73 लाख करोड़ हुई। रिटेल लोन 13% बढ़कर 15.39 लाख करोड़ हो गया। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) का प्रतिशत घटकर 1.83% हो गया, जो दर्शाता है कि बैंक ने कर्ज वसूली में सफलता पाई है। इसी के साथ SBI ने सेविंग्स अकाउंट में मिनिमम बैलेंस की शर्त पूरी तरह हटा दी है। जिससे छोटे शहरों और गांवों में रहने वाले लोगों को बैंकों से जुड़ने में आसानी हुई है। अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक जैसे बैंक ऑफ बड़ौदा, बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन बैंक, केनरा बैंक ने भी यह सुविधा प्रदान की है।
निजी बैंक के न्यूनतम बैलेंस नियम और आम जनता की दुश्वारियां
वहीं दूसरी ओर, ICICI बैंक जैसी प्रमुख निजी बैंक ने हाल ही में अपने खाताधारकों के लिए न्यूनतम बैलेंस बढ़ा दिया है। अब शहरी क्षेत्रों में नया न्यूनतम बैलेंस 50,000 किया गया है, जो पहले 10,000 था, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 10,000 रखा गया है। यहां पहले 5,000 था। अगर, ये राशि नहीं रखी गई, तो 500 तक की पेनल्टी लगाई जाएगी।
एक बदलाव लागू
निजी बैंकों में यह बदलाव लागू हो चुका है। इस तरह की कड़क शर्तें खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन रही हैं, जो बैंकिंग सेवा से जुड़ने से डरते हैं। ऐसे नियम फाइनेंशियल इंक्लूजन की भावना के खिलाफ जाते हैं और असली मायने में बैंकिंग को आम जनता से दूर कर देते हैं।
राष्ट्रीयकृत बैंक बनाम निजी बैंक, कौन किसके लिए काम करता है?
यह स्पष्ट हो चुका है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक आम आदमी की भलाई के लिए काम करते हैं। उनकी नीतियों में अधिक पारदर्शिता, बेहतर ग्राहक सहूलियत और सामाजिक जिम्मेदारी होती है। वहीं निजी बैंक मुख्य रूप से मुनाफे पर ध्यान देते हुए अमीर ग्राहकों को प्राथमिकता देते हैं। इससे राष्ट्रीयकृत बैंकों को, और मजबूत करना, और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने की आवश्यकता आज ज्यादा महसूस होती है, ताकि बैंकिंग सेवाएं हर व्यक्ति तक पहुंच सकें।
