लेखक
मुहम्मद साजिद
आज़ादी केवल लक्ष्य नहीं था। यह एक संकल्प था,और चंद्रशेखर आज़ाद इस संकल्प के प्रतीक थे।जब भी आज़ादी की बात होगी, तो ‘आज़ाद’ का नाम हमेशा याद किया जाएगा। उसी तरह जैसे उन्होंने अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर कहा था कि “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, हम आज़ाद हैं, आज़ाद ही रहेंगे!”उनकी उम्र महज 15 साल थी। उस वक्त अदालत में जज ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया, “आज़ाद”, पिता का नाम “स्वतंत्रता”, और पता “जेल”, तो अंग्रेज़ जज अवाक रह गया। यह सिर्फ एक जवाब नहीं था, ये एक क्रांतिकारी युग की शुरुआत थी।
चंद्रशेखर तिवारी से बने चंद्रशेखर आजाद
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चंद्रशेखर आज़ाद, जिनका जन्म नाम चंद्रशेखर तिवारी था। भारत के उन क्रांतिकारियों में से हैं, जिन्होंने सिर्फ लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि स्वतंत्रता का दूसरा नाम बन गए। 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में जन्मे चंद्रशेखर का बचपन आदिवासी अंचल में बीता। यहां अन्य बच्चे खेल में मग्न रहते, तो वहीं वे धनुष-बाण और निशानेबाज़ी में रुचि लेने लगे। 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड उनके मन में वो चिंगारी था। जिसने उन्हें गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन में धकेला।
बचपन से ‘आजाद’ बनने का क्षण
1921 में गिरफ्तार होने पर कोर्ट में उन्होंने खुद को ‘आज़ाद’ घोषित किया। ये सिर्फ नाम नहीं था,ये प्रतिज्ञा थी कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे। इसके बाद गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने से वे असंतुष्ट हो गए और क्रांतिकारी मार्ग की ओर बढ़े।
HSRA और भगत सिंह से मिलन
1928 में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे युवा क्रांतिकारियों को संगठित कर उन्होंने Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) की नींव रखी। उनका उद्देश्य था “ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकना, और समाजवादी भारत की स्थापना।”
Saunders की हत्या से लाजपत राय की शहादत का बदला
लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी गई। HSRA के पर्चे में लिखा गया “Saunders की मौत के साथ लाला लाजपत राय की हत्या का बदला ले लिया गया है।”
सेंट्रल असेंबली बम कांड
1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली में सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। इसमें किसी को जानबूझकर नुकसान नहीं पहुंचाया गया। उनका उद्देश्य था“औपनिवेशिक कानूनों के खिलाफ जनता को जगाना।” उनका आखिरी प्रण था कि “जिंदा नहीं पकड़ा जाऊ, 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया, जब सभी गोलियां खत्म हो गईं, तो उन्होंने अपनी आखिरी गोली खुद को मार ली। वह अपने संकल्प पर अडिग रहे, “मैं आज़ाद हूं, आज़ाद ही मरूंगा”…
