नई दिल्ली : आज संसद से एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है, जो सीधे देश की सुरक्षा, जमीन प्रबंधन और रक्षा ढांचे से जुड़ी है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि देशभर में फैली लगभग 18 लाख एकड़ रक्षा भूमि में से करीब 11,152 एकड़ जमीन पर अवैध अतिक्रमण हो चुका है। यह आँकड़ा अपने आप में बेहद चिंताजनक है, क्योंकि यह जमीन देश की रणनीतिक जरूरतों और सैन्य तैयारियों से जुड़ी होती है। रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने एक लिखित जवाब में यह पूरे विवरण के साथ संसद के सामने रखा।
सरकार से पूछा गया था कि रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली कुल जमीन में से कितनी भूमि खाली है, कितनी अवैध कब्जों में चली गई है और कितनी जगहें कानूनी विवादों में फंसी हुई हैं। जवाब में मंत्रालय ने बताया कि 18 लाख एकड़ से अधिक रक्षा भूमि में से 11,152 एकड़ हिस्से पर लोगों ने अवैध ढंग से कब्जा किया हुआ है, जबकि करीब 8,113 एकड़ जमीन अभी भी कानूनी विवादों में उलझी हुई है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी बताया कि 45,906 एकड़ जमीन ऐसी है जिसे अतिरिक्त श्रेणी में रखा गया है। यह वह जमीन है जो फिलहाल सेना की तत्काल जरूरत में नहीं है, लेकिन इसे सिर्फ रक्षा मंत्रालय के अधिकार से बाहर नहीं रखा गया है। इस अतिरिक्त जमीन की जानकारी विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों को दे दी गई है ताकि वे अपनी जरूरत के मुताबिक इस भूमि का उपयोग करने की मांग कर सकें।
रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने यह भी स्पष्ट किया कि रक्षा भूमि का उपयोग केवल सैन्य गतिविधियों, रणनीतिक जरूरतों, प्रशिक्षण, सुरक्षा, सैनिकों के आवास और भविष्य की योजनाओं के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि कई जमीनें भले ही बाहरी रूप से खाली दिखाई देती हों, लेकिन उन्हें भविष्य की सैन्य जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाता है। कई क्षेत्रों में यह जमीन ट्रेनिंग, मोबिलाइजेशन ड्रिल, KLP प्लान और मैरिड अकोमोडेशन जैसी योजनाओं के लिए पहले से निर्धारित होती है। इसलिए उन्हें खाली समझ कर अन्य उपयोग में नहीं लाया जा सकता।
संसद में एक सवाल यह भी उठाया गया कि क्या ग्रामीण समुदायों पर रक्षा भूमि के अधिग्रहण का प्रभाव जानने के लिए कोई आकलन किया गया है। इस पर सरकार ने जवाब दिया कि अभी तक ऐसा कोई आकलन नहीं किया गया है। हालांकि, निजी जमीन के अधिग्रहण की स्थिति में सरकार 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत उचित मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था करती है। यह कानून सुनिश्चित करता है कि किसी की भी निजी भूमि सैन्य उपयोग में ली जाए तो उसे उचित आर्थिक सहायता और पुनर्वास के अवसर दिए जाएं।
संसद में यह सवाल भी पूछा गया कि क्या रक्षा मंत्रालय ने सैन्य खरीद प्रक्रिया में धीमेपन के कारण लगभग 12,500 करोड़ रुपये वापस कर दिए हैं। लेकिन मंत्री संजय सेठ ने इस दावे को पूरी तरह गलत बताया। उन्होंने कहा कि संशोधित बजट का पूरा उपयोग कर लिया गया है। रक्षा खरीद प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, तेज और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने के लिए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया यानी DAP में जो संशोधन प्रस्तावित हैं, उन्हें जल्द लागू किया जाएगा। कुल मिलाकर संसद में दी गई यह जानकारी देश की रक्षा भूमि की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करती है और यह भी बताती है कि जमीन से जुड़े विवाद, अतिक्रमण और प्रक्रियात्मक चुनौतियाँ आज भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। सरकार ने कहा कि इन समस्याओं को हल करने के लिए लगातार प्रयास जारी रहेंगे।
