नेताजी के चहेते आबिद हसन सफरानी का ‘जय हिंद’ का नारा, आज भी देशभक्ति का प्रतीक
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी की लड़ाई में सिर्फ़ नेताजी सुभाषचंद्र बोस ही नहीं, बल्कि उनके साथ खड़े कई अनसुने सिपाही भी थे। उन्हीं में से एक थे आबिद हसन सफ़रानी, जिन्हें दुनिया उस शख्स के तौर पर याद करती है, जिसने भारत को दिया सबसे ताक़तवर नारा- “जय हिंद”।
यह नारा नहीं, आजादी का एक जज़्बा
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आज सेना की सलामी से लेकर स्कूल के प्रोग्राम, राजनीतिक भाषणों और आम लोगों के दिलों तक “जय हिंद” का नारा गूंजता है। मगर, बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके जनक नेताजी नहीं, बल्कि उनके सबसे करीबी सहयोगी और दो साल तक निजी सचिव रहे आबिद हसन सफरानी थे। इतिहासकार चौधरी आचार्य की तेलुगू किताब और नेताजी के भतीजे शिशिर कुमार बोस की पुस्तक ‘INA in India Today’ में इसका विस्तार से ज़िक्र मिलता है कि 1941 में बर्लिन में आयोजित ‘Free India Centre’ की पहली बैठक में आबिद हसन ने पहली बार ‘जय हिंद’ का नारा दिया। नेताजी को यह इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे हमेशा के लिए अपना लिया।
नेताजी ने गांधी ब्रिगेड का बनाया प्रमुख
1912 में हैदराबाद में जन्मे आबिद हसन का संबंध एक गहरे देशभक्त परिवार से था। इंजीनियरिंग में डिस्टिंक्शन लेने के बाद वह बर्लिन पढ़ने गए, और वहीं नेताजी से प्रभावित होकर आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गए। बोस ने उनकी नेतृत्व क्षमता देखकर उन्हें गांधी ब्रिगेड का प्रमुख बनाया। वह अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तेलुगु और पंजाबी सहित कई भाषाओं के धनी थे।
गांधी, नेहरू, नेताजी और अबुल कलाम पुकारते थे अम्मा जान
उनके परिवार को भी देशप्रेम की परंपरा विरासत में मिली थी। उनकी मां बेगम अमीर हसन को गांधी, नेहरू, नेताजी और अबुल कलाम आज़ाद “अम्मा जान” कहकर पुकारते थे। आबिद हसन और उनका परिवार महात्मा गांधी के बेहद करीब था। उनकी मां ने अपनी पूरी संपत्ति देश की आज़ादी के लिए न्यौछावर कर दी। यही वजह थी कि जेल के दिनों में जब उन्हें ‘लाल किला मुकदमा’ में मौत की सज़ा का डर था, तो गांधी, नेहरू और सरोजिनी नायडू तक उनके लिए सामने आए।
आजादी के बाद निभाई राजनयिक की भूमिका
1947 के बाद आबिद हसन भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए, और मिस्र, इराक, तुर्की, सेनेगल, जाम्बिया, आइवरी कोस्ट जैसे देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह इराक में भारत के राजदूत भी रहे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने हैदराबाद के गोलकुंडा में एक बागवानी फ़ार्म शुरू किया, और हर साल नेताजी को याद करने के लिए कोलकाता जाते। 1984 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी हर बार गूंजती है जब कोई हिंदुस्तानी कहता है – “जय हिंद”। आबिद हसन सफ़रानी का नाम भले ही इतिहास की किताबों में उतना चमकदार न दिखे जितना नेताजी का, लेकिन उनकी गढ़ी हुई यह पुकार हिंदुस्तान की आत्मा में बस गई है। “जय हिंद” सिर्फ़ दो शब्द नहीं, यह वह भावना है जिसने भाषा, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं को तोड़कर पूरे देश को एक डोर में बांध दिया।
