नई दिल्ली : चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने बड़ा और सख्त फैसला लिया है। अब कोई भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार बिना मंजूरी के अपना विज्ञापन जारी नहीं कर सकेगा। टीवी, रेडियो से लेकर सोशल मीडिया और वॉइस मैसेज तक हर प्लेटफॉर्म पर ‘प्री-सर्टिफिकेशन’ अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले का मकसद चुनाव के दौरान फेक न्यूज, भ्रामक प्रचार और एआई से बनाए गए फर्जी कंटेंट पर रोक लगाना है। चुनाव आयोग ने साफ निर्देश दिए हैं कि किसी भी तरह का राजनीतिक विज्ञापन जारी करने से पहले उसे मीडिया प्रमाणीकरण एवं निगरानी समिति यानी MCMC से प्रमाणित कराना जरूरी होगा। यह नियम सभी इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर लागू होगा, जिसमें टीवी, रेडियो, सोशल मीडिया, वेबसाइट, ई-पेपर, बल्क एसएमएस और वॉइस मैसेज शामिल हैं। आयोग के इस फैसले को चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हाल के वर्षों में चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और एडिटेड वीडियो के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने के कई मामले सामने आए हैं।
MCMC की भूमिका इस पूरे सिस्टम में बेहद अहम होगी। राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को अपने सभी विज्ञापन पहले इस कमेटी के पास भेजने होंगे। कमेटी यह जांच करेगी कि विज्ञापन में कोई भ्रामक दावा, गलत जानकारी या एआई से तैयार किया गया फर्जी कंटेंट तो नहीं है। अगर विज्ञापन नियमों के खिलाफ पाया जाता है, तो उसे मंजूरी नहीं दी जाएगी। यानी अब बिना जांच के कोई भी राजनीतिक संदेश जनता तक नहीं पहुंच पाएगा। “चुनाव आयोग का उद्देश्य है कि मतदाता तक सही और सटीक जानकारी पहुंचे, ताकि वह बिना किसी भ्रम के अपना वोट डाल सके।”
यही नहीं, चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया पर भी सख्ती बढ़ा दी है। अब हर उम्मीदवार को नामांकन के समय अपने सभी आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी देनी होगी। इससे फर्जी अकाउंट्स के जरिए किए जाने वाले प्रचार पर नजर रखी जा सकेगी। अक्सर देखा गया है कि चुनाव के दौरान नकली प्रोफाइल बनाकर गलत जानकारी फैलाई जाती है, जिससे मतदाताओं को भ्रमित किया जाता है। आयोग का यह कदम ऐसे मामलों पर लगाम लगाने में मददगार साबित हो सकता है।
इसके अलावा चुनावी खर्च को लेकर भी आयोग ने कड़े निर्देश दिए हैं। सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को अपने प्रचार पर किए गए खर्च का पूरा ब्यौरा देना होगा। खासतौर पर डिजिटल और सोशल मीडिया पर खर्च की जानकारी चुनाव खत्म होने के 75 दिनों के भीतर जमा करनी होगी। इससे चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी और यह भी साफ हो सकेगा कि किस प्लेटफॉर्म पर कितना पैसा खर्च किया गया।
कुल मिलाकर चुनाव आयोग का यह कदम चुनावी प्रक्रिया को साफ, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है। अब देखना होगा कि राजनीतिक दल और उम्मीदवार इन नियमों का कितना पालन करते हैं और यह सख्ती चुनावी माहौल को कितना प्रभावित करती है।
