नई दिल्ली : देश के चर्चित “स्नेक वेनम केस” में यूट्यूबर एल्विश यादव को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने साल 2023 में दर्ज उस एफआईआर को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर नोएडा की कथित रेव पार्टी में सांप के जहर के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया था। यह मामला नवंबर 2023 में सामने आया था, जब उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक कथित रेव पार्टी को लेकर बड़ा खुलासा हुआ था। आरोप था कि पार्टी में सांपों और उनके जहर का इस्तेमाल मनोरंजन और नशे के लिए किया जा रहा था। इस मामले में पुलिस ने एल्विश यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था और 17 मार्च 2024 को उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। अब इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए एफआईआर को ही रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस मामले में एनडीपीएस एक्ट के तहत लगाए गए आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि जिस कथित साइकोट्रॉपिक पदार्थ की बात की जा रही थी, वह एनडीपीएस एक्ट, 1985 की निर्धारित सूची में शामिल ही नहीं है। अदालत ने यह भी नोट किया कि एल्विश यादव के पास से किसी भी तरह की बरामदगी नहीं हुई थी। चार्जशीट में केवल यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक सहयोगी के जरिए कथित तौर पर ऑर्डर दिया था। ऐसे में अदालत ने माना कि इन तथ्यों के आधार पर एनडीपीएस एक्ट लगाना उचित नहीं है।
इस मामले का दूसरा अहम पहलू वन्यजीव संरक्षण कानून से जुड़ा हुआ था। कोर्ट ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 55 का हवाला देते हुए कहा कि इस कानून के तहत कार्रवाई केवल अधिकृत अधिकारी की शिकायत के आधार पर ही शुरू की जा सकती है। पीठ ने कहा कि मौजूदा एफआईआर में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, इसलिए यह विधिसम्मत नहीं मानी जा सकती। इसके अलावा अदालत ने भारतीय दंड संहिता के तहत लगाए गए आरोपों पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ये आरोप स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं होते, क्योंकि ये एक पहले की शिकायत का हिस्सा थे, जिसे पहले ही बंद किया जा चुका है। इन सभी कानूनी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह एफआईआर न्यायिक जांच की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के तथ्यों या आरोपों की सच्चाई पर कोई टिप्पणी नहीं की है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने सक्षम प्राधिकरण को यह छूट भी दी है कि वह कानून के अनुसार उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए, विशेष रूप से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 55 के तहत, नई शिकायत दर्ज कर सकता है और आगे की कार्रवाई शुरू कर सकता है। गौरतलब है कि इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख भी दिखाया था। अदालत ने कहा था कि अगर लोकप्रिय लोग आवाजहीन जीवों, जैसे सांपों, का इस तरह इस्तेमाल करते हैं, तो इससे समाज में गलत संदेश जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि क्या किसी को चिड़ियाघर जाकर जानवरों के साथ इस तरह का व्यवहार करने की अनुमति दी जा सकती है, और क्या यह कानून का उल्लंघन नहीं होगा। वहीं, एल्विश यादव की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने अदालत में दलील दी थी कि वह एक वीडियो शूट के लिए गायक फाजिलपुरिया के निमंत्रण पर वहां गए थे। उन्होंने कहा कि न तो किसी रेव पार्टी के ठोस सबूत हैं और न ही किसी मादक पदार्थ के इस्तेमाल के प्रमाण मिले हैं। साथ ही, लैब रिपोर्ट के आधार पर यह भी दावा किया गया कि बरामद किए गए नौ सांप विषैले नहीं थे और एल्विश यादव घटनास्थल पर मौजूद भी नहीं थे। दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष इससे अलग रहा। सरकार की ओर से कहा गया कि पुलिस ने मौके से नौ सांप बरामद किए थे, जिनमें पांच कोबरा शामिल थे, और सांप के जहर के इस्तेमाल के संकेत भी मिले थे। अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि आखिर सांप का जहर किस तरह निकाला जाता है और कथित तौर पर पार्टियों में इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एल्विश यादव को बड़ी कानूनी राहत दी है। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि कानून के अनुसार सही प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो मामले में दोबारा कार्रवाई की जा सकती है।
