प्रयागराज/बरेली : यूपी के बरेली में पिछले साल हुए बवाल के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए आधा दर्जन आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मामला गंभीर प्रकृति का है, और इसकी विस्तृत जांच जरूरी है। इसलिए एफआईआर रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दिया आदेश
केस की पैरवी करने वाले अधिवक्त ने बताया कि यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने दिया।कोर्ट में यह याचिकाएं आशू,अजमल राफी, मोहम्मद नईम कुरैशी,मोहम्मद मोवीन, मोहम्मद फैजान और मोहम्मद साजिद उर्फ साजिद सकलैनी की ओर से दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को निरस्त किया जाए और गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाए। क्योंकि, उनका दावा था कि उन्हें झूठा फंसाया गया है।
कोर्ट ने ठुकराई बचाव पक्ष की दलील
बचाव पक्ष की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि घटना के समय करीब 200 से 250 लोगों की भीड़ मौजूद थी। ऐसे में केवल 28 लोगों की पहचान करना संभव नहीं है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पुलिसकर्मी आम लोगों के बीच लगातार रहते हैं। इसलिए उनके लिए कुछ लोगों की पहचान कर पाना असंभव नहीं माना जा सकता।
पुलिस पर हमला और हिंसा का आरोप
अभियोजन पक्ष के मुताबिक 26 सितंबर, 2025 को कानपुर में आई लव मुहम्मद को लेकर तथाकथित घटना के विरोध में एक प्रदर्शन की तैयारी भी। मगर, इस प्रदर्शन से पहले ही बरेली के हालात बिगड़ गए थे। बताया गया कि यह प्रदर्शन कानपुर समेत कुछ जिलों में मुस्लिम युवाओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों के विरोध में किया गया था। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने आपत्तिजनक नारे लगाए। पुलिस द्वारा रोकने की कोशिश करने पर भीड़ उग्र हो गई, और पुलिसकर्मियों पर हमला कर दिया। पुलिस का कहना है कि भीड़ ने ईंट-पत्थर, लाठी-डंडों से हमला किया। इसके साथ ही पेट्रोल बम फेंके गए और फायरिंग भी की गई, जिससे कानून व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ गई।
28 नामजद और कई अज्ञात के खिलाफ मुकदमा
इस मामले में शहर के थाना बारादरी के तत्कालीन एसएचओ धनंजय पांडे की ओर से 28 नामजद और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके अलावा भी शहर कोतवाली,प्रेमनगर, कैंट आदि में 11 एफआईआर दर्ज की गई थी।याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे घटना में शामिल नहीं थे और रंजिश के चलते उन्हें मुकदमे में फंसा दिया गया। कुछ आरोपियों ने यह भी दावा किया कि घटना के समय वे किसी अन्य स्थान पर मौजूद थे।
अदालत ने कहा-जांच पूरी होने दें
इस मामले में सरकार की ओर से पेश अपर शासकीय अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि यह घटना बेहद गंभीर है। आरोपियों ने पुलिस पर जानलेवा हमला किया और कानून व्यवस्था को चुनौती दी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि मामले की प्रकृति को देखते हुए गहन जांच आवश्यक है। इसलिए इस चरण पर प्राथमिकी रद्द करना उचित नहीं होगा। इसी के साथ अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।
