प्रयागराज/लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति -जनजाति (SC-ST) मामलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि केवल इस आधार पर कि पीड़ित SC-ST वर्ग से है, अदालत के लिए एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विशेष अदालत या मजिस्ट्रेट को पहले आरोपों का मूल्यांकन करना चाहिए और उसके बाद यह तय करना चाहिए कि मामले में पुलिस से एफआईआर दर्ज कराकर जांच करानी है या कंप्लेंट केस के रूप में सुनवाई आगे बढ़ानी है।
हाई कोर्ट ने खारिज की आपराधिक अपील
यह फैसला न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकलपीठ ने सुनाया।कोर्ट ने आजमगढ़ निवासी कुसुम कनौजिया की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। अपील में कुसुम कनौजिया ने पवन चौबे और चार अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए विशेष न्यायाधीश (SC-ST अधिनियम) द्वारा 19 जनवरी 2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
SC-ST एक्ट से न्यायिक विवेकाधिकार समाप्त नहीं होता
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 और 1995 के नियम 5 पुलिस अधिकारियों को एफआईआर दर्ज करने और जांच करने का निर्देश देते हैं, लेकिन इससे अदालत का न्यायिक विवेकाधिकार समाप्त नहीं होता। अदालत को यह अधिकार है कि वह आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए यह तय करे कि मामले में पुलिस जांच जरूरी है या शिकायत केस के रूप में कार्यवाही आगे बढ़ाई जाए।
अदालत ने पुराने फैसले का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसले “आशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य” का भी उल्लेख किया।अदालत ने कहा कि उस फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि विशेष अदालत या मजिस्ट्रेट को कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही कार्यवाही करनी चाहिए।
मजिस्ट्रेट द्वारा जांच करना गलत बताया
कोर्ट ने यह भी कहा कि SC-ST एक्ट की धारा 18-A के अनुसार विशेष अदालत को इस तरह की जांच करने का अधिकार नहीं है।अदालत के अनुसार इस मामले में मजिस्ट्रेट ने आवेदन पर खुद ही जांच कर दी, जो कि कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं था।
अधिवक्ता ने दी BNSS 2023 का हवाला
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 173(4) के तहत दायर आवेदन को अधीनस्थ अदालत ने गलत तरीके से खारिज कर दिया। उनका कहना था कि अदालत को एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय मजिस्ट्रेट ने आरोपों की स्वयं जांच शुरू कर दी, जो कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा
इस मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि अदालत को पहले आरोपों की प्रारंभिक समीक्षा करनी चाहिए और उसके बाद यह तय करना चाहिए कि मामले में पुलिस जांच जरूरी है या शिकायत के आधार पर आगे की कार्यवाही की जाए। इसी आधार पर अदालत ने अपील को खारिज कर दिया।
