बरेली की वो विरासत, जहां आज भी सुनाई देती हैं रहस्यमयी आवाज़ें!
बरेली : भारत की ऐतिहासिक धरती पर कई ऐसे राज छुपे हैं, जो आज भी समय की धूल में दबे हुए हैं, लेकिन कभी-कभी उनमें से कुछ जगहें लोगों को आज भी रहस्यमयी कहानियों और डरावनी घटनाओं से जोड़ देती हैं। ऐसी ही एक जगह है बरेली कैंट में स्थित “गोरों का कब्रिस्तान”, अंग्रेज़ों का बनाया गया। वह श्मशान स्थल, जो आज 200 साल बाद भी लोगों को अजीब सी सरसराहट और रहस्यमयी आवाज़ों से चौंका देता है। यह कहना है यहां के बाशिंदों का। मगर, “The justice Hindi” पुष्टि नहीं करता।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है ‘गोरों का कब्रिस्तान’
बताया जाता है इस कब्रिस्तान का निर्माण सन् 1889 में अंग्रेजी हुकूमत के दौर में हुआ था। यह कब्रिस्तान उस दौर में बना, जब अंग्रेज़ बरेली में अपना प्रशासन स्थापित कर रहे थे। उस वक्त नकटिया युद्ध जैसे संघर्ष भी हुए, जिनमें अंग्रेजी अफसर और सिपाही मारे गए। अंग्रेजों ने इन सैनिकों को दफनाने के लिए एक विशाल ज़मीन खरीदी, और यहीं पर इनकी कब्रें बनाई गईं। आज भी इस कब्रिस्तान में ब्रिटिश ऑफिसर्स, सैनिकों और उनके परिवारजनों की कई कब्रें मौजूद हैं। कुछ टूटी, कुछ मिट चुकीं, परंतु इतिहास का बोझ आज भी इन पत्थरों पर दर्ज है।
लोगों का कहना -“रात को आती हैं रहस्यमयी आवाज़ें”
स्थानीय लोगों और गुजरने वाले राहगीरों के मुताबिक, आज भी रात के समय इस कब्रिस्तान से अजीबो -ग़रीब आवाज़ें सुनाई देती हैं। कभी फुसफुसाहट, कभी बूटों की आवाज़, तो कभी कोई चीख…हालांकि यह बातें “The justice Hindi “प्रमाणित नहीं करता हैं, लेकिन “कई पीढ़ियों से सुनी जा रही हैं।” “यहां का डर इतिहास से जुड़ा है। लोगों के मन में 200 सालों से जमा वह स्मृति है, जिसे वे आज भी अपने बच्चों को सुनाते हैं।” इसका यह ब्रिटिश दौर का अतीत आज भी वहां के निवासियों के मन में एक अजीब सी जिज्ञासा और डर दोनों भर देता है। कब्रों के पास से गुजरते हुए लोगों को एक “थरथराहट” का अनुभव होता है, मानो कोई अदृश्य शक्ति वहां आज भी घूम रही हो। जिसके चलते लोग उधर से दिन में भी गुजरने से बचते हैं।
खंडहर नहीं, पर इतिहास की अनसुनी चीखें जरूर हैं यहां
कुछ कब्रों के पत्थर पर आज भी अंग्रेजी में नाम खुदे हुए हैं। इसमें Captain Richard Evans, Lt. Charles Frederick, आदि। कुछ कब्रें समय की मार से मिट चुकी हैं, लेकिन उनका मौन आज भी बहुत कुछ कहता है।
