पोषण ट्रैकर में खुलासा 2.70 लाख बच्चों की जांच में बड़ा आंकड़ा सामने, नवाबगंज सबसे ज्यादा प्रभावित
बरेली : यूपी के बरेली में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। पोषण ट्रैकर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार जिले में शून्य से पांच वर्ष तक के करीब 2.70 लाख बच्चों की जांच में से लगभग 74 हजार बच्चों की लंबाई उम्र के मानकों से कम पाई गई है। इस आंकड़े ने स्वास्थ्य विभाग और अभिभावकों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। जिला कार्यक्रम अधिकारी मनोज कुमार के मुताबिक, बच्चों की लंबाई कम होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे अहम वजह गर्भावस्था के दौरान मां को पर्याप्त पौष्टिक आहार न मिलना, एनीमिया और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हैं। इसका असर बच्चे के जन्म के समय ही उसके वजन और लंबाई पर पड़ता है, जो आगे चलकर विकास को प्रभावित करता है।
कम लंबाई, कमजोर सेहत
स्वास्थ्य विभाग द्वारा आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच, टीकाकरण और पोषण संबंधी सलाह दी जाती है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और वीएचएसएनडी कार्यक्रमों के जरिए मुफ्त इलाज और परामर्श की सुविधा भी उपलब्ध है, लेकिन कई परिवार इन सेवाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पाते, जिससे समस्या बनी रहती है।
गांवों में ज्यादा कुपोषण
गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में भर्ती कर विशेष देखभाल और पौष्टिक आहार दिया जाता है। डॉक्टरों के अनुसार बच्चों को करीब 14 दिन तक निगरानी में रखकर उनके वजन और स्वास्थ्य में सुधार सुनिश्चित किया जाता है।रिपोर्ट के मुताबिक, बरेली शहर में सबसे कम 1,225 बच्चे प्रभावित हैं, जबकि नवाबगंज में सबसे अधिक 8,551 बच्चों की लंबाई सामान्य से कम पाई गई। इसके अलावा शेरगढ़,भुता,फरीदपुर,आलमपुर, जाफराबाद, फतेहगंज पश्चिमी, मीरगंज और बहेड़ी जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित मिले हैं।
रिपोर्ट ने खोली पोल
स्वास्थ्य मंत्रालय के मानकों के अनुसार बच्चों की लंबाई और वजन उम्र और लिंग के आधार पर तय होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही पोषण, नियमित स्वास्थ्य जांच और जागरूकता से इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। गर्मी बढ़ने के साथ ही कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा देखने को मिल रहा है। जिससे जिला अस्पताल के एनआरसी में बेड भी भरने लगे हैं। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि लगातार निगरानी और उपचार से बच्चों की स्थिति में सुधार लाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर जागरूकता बढ़ाना अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
