निष्क्रिय जनधन खातों से वित्तीय समावेशन पर बड़ा सवाल
संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
प्रधानमंत्री जनधन योजना (Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana) की शुरुआत 28 अगस्त 2014 को हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “गरीबों के लिए बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं तक आसान पहुंच” देने वाली ऐतिहासिक योजना बताया था। इस योजना के तहत खाताधारकों को बिना न्यूनतम शेष राशि, मुफ्त डेबिट कार्ड, बीमा कवर और ओवरड्राफ्ट जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। भारतीय रिज़र्व बैंक और विभिन्न रिपोर्टों (जैसे- Report of the Committee on Financial Inclusion, RBI 2016) में इसे गरीबों और वंचित तबके को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में मील का पत्थर माना।
13 करोड़ खाते निष्क्रिय
लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि अब तक लगभग 56 करोड़ जनधन खाते खोले गए। इनमें से 13 करोड़ खाते (लगभग 23%) निष्क्रिय हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 2.75 करोड़ खाते निष्क्रिय पाए गए। 31 जुलाई 2025 तक की स्थिति के अनुसार, लंबे समय से लेन-देन न होने के कारण ये खाते निष्क्रिय हुए। निष्क्रिय खातों को फिर से सक्रिय करने के लिए खाताधारकों को शाखा में जाकर KYC (Know Your Customer) अपडेट कराना होगा। लाभ तो हैं, लेकिन उपयोग क्यों नहीं हो रहा है। जनधन खातों में प्रति माह 10,000/- रुपये की निकासी की सुविधा थी। इसमें ओवरड्राफ्ट सुविधा, शून्य न्यूनतम शेष राशि, जमा पर ब्याज, दुर्घटना में मृत्यु/पूर्ण विकलांगता पर 2 लाख का बीमा कवर है।
आंशिक विकलांगता पर 1 लाख बीमा कवर।
इसमें नामांकन (Nominee) की सुविधा है, फिर भी इतनी सुविधाओं के बावजूद 13 करोड़ खातों का निष्क्रिय होना यह संकेत देता है कि वित्तीय समावेशन का सपना अधूरा है। इनके निष्क्रिय होने का मुख्य कारण जागरूकता की कमी है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग जनधन खाते का वास्तविक लाभ नहीं जानते। प्रवासी मजदूर और असंगठितक्षेत्र, खाते खुल गए, लेकिन नियमित आय या लेन-देन न होने से निष्क्रिय हो गए। ब्यूरोक्रेसी और औपचारिकताओ के कारण KYC अपडेट नहीं और , बैंक शाखा तक पहुँच जैसी कठिनाइयों ने उपयोगिता घटाई है।
गरीबी, और अस्थिर रोजगार ने खातों का इस्तेमाल किया सीमित
सामाजिक-आर्थिक कारण,गरीबी और अस्थिर रोजगार ने खातों का इस्तेमाल सीमित कर दिया है। भारतीय अर्थशास्त्री सी. रंगराजन और रघुराम राजन की रिपोर्ट्स (Planning Commission, RBI) में पहले भी यह चेतावनी दी गई थी कि केवल खाता खोलना वित्तीय समावेशन नहीं है, असली चुनौती सक्रिय उपयोग है। इसके लिए आगे का रास्ता जागरूकता अभियान है। जिसके चलते ग्रामीण, और शहरी गरीब तबके को खातों के वास्तविक लाभ समझाना। डिजिटल साक्षरता के तहत UPI, मोबाइल बैंकिंग को सरल भाषा में पहुँचाना। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से लिंक कर पेंशन, स्कॉलरशिप, गैस सब्सिडी आदि सीधे इन खातों से जोड़ना भी है। निगरानी तंत्र के तहत बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट्स (BCs) को सक्रिय कर लोगों को लेन-देन के लिए प्रेरित करना। यह लेखक के निजी विचार हैं।
