ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और निर्यात में अहम भूमिका, भैंस के संरक्षण और वैज्ञानिक विकास पर जोर
बरेली : भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (ICAR-IVRI), इज्जतनगर में आयोजित राष्ट्रीय भैंस विकास सम्मेलन- 2025 के समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. अमरेश कुमार, महानिदेशक, केसीएमटी ने कहा कि भैंस भारत की “ब्लैक गोल्ड” है। उन्होंने कहा कि भैंस केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका का मजबूत आधार है। डॉ. अमरेश कुमार ने कहा कि हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में भैंस को पारंपरिक रूप से संपत्ति के रूप में देखा जाता रहा है। समय के साथ परिस्थितियां बदली हैं, लेकिन भैंस की उपयोगिता और महत्त्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि भैंस मांस (बफैलो मीट) के निर्यात से भारत को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है, इसके बावजूद नर भैंसों के वैज्ञानिक उपयोग और मांस उत्पादन के क्षेत्र में योजनाबद्ध विकास की अभी भी आवश्यकता है। उन्होंने आईसीएआर द्वारा किए गए शोधों का हवाला देते हुए कहा कि प्रारंभिक अवस्था में वैज्ञानिक पोषण देने से नर भैंसों के मांस की गुणवत्ता, प्रोटीन कंटेंट और अन्य गुणों में सुधार होता है, जबकि फैट कंटेंट कम होता है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पशुओं से निकलने वाली मीथेन गैस को नियंत्रित करने में पोषण विज्ञान की अहम भूमिका है और इस दिशा में अनुसंधान को और तेज किया जाना चाहिए।
आनुवंशिक सुधार पर जोर

भैंसों के आनुवंशिक सुधार को जरूरी बताते हुए डॉ. कुमार ने भारत में ब्रीडर सोसायटी के गठन पर बल दिया। उन्होंने कहा कि उच्च दुग्ध उत्पादन देने वाली नस्लों के आधार पर ही वैज्ञानिक ढंग से जेनेटिक सुधार किया जाना चाहिए, ताकि उत्पादकता में वास्तविक बढ़ोतरी हो सके। इस अवसर पर डॉ. एस.के. सिंह, संयुक्त निदेशक (शोध) एवं कार्यवाहक निदेशक, IVRI ने कहा कि यह सम्मेलन वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्र के बीच संवाद का प्रभावी मंच बना है। उन्होंने भैंस संरक्षण, प्रजनन सुधार, रोग प्रबंधन, जलवायु सहनशीलता और किसान आय वृद्धि के लिए विशेष नीतिगत पहल की आवश्यकता बताई।
भारत विश्व में अग्रणी

समापन सत्र में डॉ. इंद्रजीत सिंह, अध्यक्ष, इंडियन सोसाइटी फॉर बफैलो डेवलपमेंट एवं कुलपति, बिहार एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी ने कहा कि भारत के पास दुनिया की लगभग 56 प्रतिशत भैंस आबादी है और वैश्विक भैंस दुग्ध उत्पादन में भारत का योगदान करीब 68 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में प्रस्तुत शोध और सुझावों को नीति-सुझाव पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर सरकार तक पहुंचाया जाएगा। आयोजन सचिव डॉ. ज्ञानेन्द्र सिंह ने बताया कि सम्मेलन में देश-विदेश से लगभग 230 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। छह तकनीकी सत्रों और एक राउंड टेबल सत्र में आनुवंशिक सुधार, पोषण, रोग प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल तकनीक और वैल्यू चेन विकास जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई। कुल 140 से अधिक शोध पत्र और पोस्टर प्रस्तुतियां दी गईं। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन भैंस विकास के क्षेत्र में वैज्ञानिक, नीतिगत और व्यावहारिक दृष्टि से एक मील का पत्थर साबित होगा।
