मुख्यमंत्री के बयान को बताया गैर जिम्मेदाराना और संविधान विरोधी
बरेली : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान को लेकर अब श्रमिक संगठनों में नाराजगी देखने को मिल रही है।बरेली ट्रेड यूनियन फेडरेशन के महामंत्री संजीव मेहरोत्रा ने मुख्यमंत्री के उस बयान की कड़ी आलोचना की है। जिसमें ट्रेड यूनियनों को उद्योगों के बंद होने और मजदूरों की बदहाली के लिए जिम्मेदार बताया गया था। फेडरेशन ने मुख्यमंत्री के बयान को “गैर जिम्मेदाराना” और “संविधान विरोधी” करार देते हुए कहा कि ट्रेड यूनियन लोकतांत्रिक व्यवस्था और श्रमिक अधिकारों का अहम हिस्सा हैं। संगठन का कहना है कि ट्रेड यूनियनों पर सवाल उठाना सीधे तौर पर श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।
ट्रेड यूनियन बनाना संवैधानिक अधिकार
फेडरेशन के महामंत्री संजीव मेहरोत्रा ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि औद्योगिक शांति और श्रमिक हितों की रक्षा के लिए ट्रेड यूनियनों की व्यवस्था लागू की गई थी। उन्होंने कहा कि भारत में वर्ष 1926 में ट्रेड यूनियन कानून लागू हुआ और संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत ट्रेड यूनियन बनाना मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री का बयान संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।
“कॉर्पोरेट नीतियों से बंद हुए उद्योग”
फेडरेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं इंकलाबी मजदूर केंद्र के सचिव ध्यान चंद मौर्या ने कहा कि उद्योगों के बंद होने के पीछे ट्रेड यूनियन नहीं बल्कि कॉर्पोरेट समर्थित आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं।उन्होंने कानपुर की मिलों का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी उद्योगों को बंद किया गया। उन्होंने दावा किया कि कई उद्योगों को बंद करने के बाद उनकी जमीनों का इस्तेमाल रियल एस्टेट कारोबार के लिए किया गया। साथ ही नोटबंदी, जीएसटी और आर्थिक मंदी को भी उद्योगों की बदहाली का कारण बताया गया।
“मजदूर आधुनिक बंधुआ व्यवस्था में काम करने को मजबूर”
फेडरेशन की उप महामंत्री गीता शांत ने कहा कि उद्योगों की स्थिति नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, निजीकरण, बढ़ती लागत और कुप्रबंधन के कारण कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियन हमेशा मजदूरों के सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार सुरक्षा की लड़ाई लड़ती रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नए लेबर कोड और श्रम कानूनों में बदलाव के चलते मजदूरों के कई अधिकार कमजोर हुए हैं। साथ ही यह भी कहा कि प्रदेश में लंबे समय से न्यूनतम मजदूरी का संशोधन नहीं हुआ है।
सरकार से किए गए वादों की दिलाई याद
फेडरेशन नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा श्रमिकों के वेतन, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की मजदूरी और आंगनबाड़ी व आशा कार्यकर्ताओं के मानदेय को लेकर जो घोषणाएं की गई थीं, वे अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। संगठन का आरोप है कि ट्रेड यूनियनों को दोष देना सरकार की आर्थिक और नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने की कोशिश है।
