देश के पहले राष्ट्रगीत के रचयिता, अंग्रेजों की यातनाओं से खोए पिता
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी की जंग का ज़िक्र होते ही हमारे ज़ेहन में झाँसी की रानी, नाना साहेब, तात्या टोपे और मंगल पांडे जैसे नाम गूंजते हैं। मगर, दोस्तों… क्या आपने उस शख़्स का नाम सुना है, जिसे 1857 की क्रांति का ‘ब्रेन’ कहा जाता है? जी हाँ- अज़ीमुल्लाह ख़ाँ यूसुफ़ज़ई। कानपुर की मिट्टी से निकला ये नौजवान न सिर्फ़ 1857 की जंग-ए-आज़ादी का क्रांतिदूत था, बल्कि वही शख़्स था जिसने बुलंद किया “भारत मात की जय” और लिखा पहला कौमी तराना “हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा”।
वीर सावरकर ने की तारीफ
अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को ‘कानपुर के इतिहास’ लक्ष्मी चंद्र त्रिपाठी, नारायण प्रसाद) और वीर सावरकर की लिखी ‘1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ किताब में दोनों इस बात पर सहमत हैं कि अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के बिना 1857 की क्रांति अधूरी है। उनका जन्म 1820 है, तो कुछ स्रोतों में 1830 में कानपुर के पटकापुर में हुआ।
अंग्रेजों की यातनाओं से पिता का इंतकाल
अज़ीमुल्लाह ख़ाँ के पिता नजीबुल्लाह ख़ाँ मज़दूरी करते थे, और माँ करीमन गृहिणी थीं। बचपन में ही अंग्रेज़ अफ़सरों के अत्याचार झेले, एक अफ़सर द्वारा उनके पिता को अस्तबल साफ़ न करने पर दी गई सज़ा इतनी अमानवीय थी कि उनकी जान चली गई। यही घटनाएँ अज़ीमुल्लाह के दिल में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ नफ़रत और आज़ादी की आग भर गईं।
नाना साहेब का सेनापति और सलाहकार
कानपुर के बिठूर में जब पेशवा नाना साहेब की पेंशन अंग्रेज़ों ने बंद कर दी, तो उन्होंने अज़ीमुल्लाह ख़ाँ को अपना प्रधान सलाहकार बना लिया। यहीं से अज़ीमुल्लाह की असल कहानी शुरू होती है। उन्होंने इंग्लैंड जाकर नाना साहेब की पेंशन बहाल करने की कोशिश की, मगर असफल रहे। लेकिन यूरोप यात्रा ने उन्हें एक नया सबक दिया- “अगर यूरोप की संयुक्त फौजें हार सकती हैं, तो हिंदुस्तान भी अंग्रेज़ों को हरा सकता है।”इसी सोच ने 1857 की क्रांति की बुनियाद रखी।
1857 की क्रांति का मस्तिष्क
1857 की लड़ाई में नाना साहेब, तात्या टोपे और झाँसी की रानी जैसे योद्धाओं को जो सैन्य रणनीति मिली। उसके सूत्रधार अज़ीमुल्लाह थे। इतिहास की कुछ किताबों के मुताबिक उन्होंने रूस से भी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मदद लेने की कोशिश की थी। अंग्रेज़ी रिकॉर्ड उन्हें “The most dangerous and cunning rebel leader” कहते हैं। उनको 1857 की क्रांति का मस्तिष्क (ब्रेन) कहा जाता है।
अज़ीमुल्लाह ख़ाँ का कौमी तराना- पहला राष्ट्रगीत
अज़ीमुल्लाह ख़ाँ का लिखा गीत “हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा…” 1857 की लड़ाई का पहला राष्ट्रीय गीत माना जाता है। यह गीत ‘पयाम-ए-आज़ादी’ अख़बार में प्रकाशित हुआ और क्रांतिकारियों का जज़्बा बढ़ाने लगा। इस गीत में गंगा-जमुना की तहज़ीब, हिमालय की निगेहबानी और हिंदू -मुस्लिम-सिख एकता का ज़िक्र है। यही वह भाव है, जिसने बाद में इक़बाल के “सारे जहाँ से अच्छा” को प्रेरित किया।
मौत के रहस्य से नहीं उठा पर्दा
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि 1857 के बाद कानपुर के पास युद्ध करते हुए अज़ीमुल्लाह शहीद हो गए। दूसरी राय है कि वे नाना साहेब के साथ नेपाल गए और वहीं 1859 में उनकी मृत्यु हुई। लेकिन एक बात तय है- अज़ीमुल्लाह की शहादत ने आज़ादी की लौ हमेशा के लिए जला दी। लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा-“भारत मात की जय का नारा सबसे पहले अज़ीमुल्लाह ख़ाँ ने बुलंद किया था।” ये बयान हमें याद दिलाता है कि इतिहास के पन्नों में गुम हो चुके नायक ही असली आज़ादी के दास्तानगो थे।
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हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा, पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा। ये है हमारी मिल्कियत, हिन्दुस्तान हमारा, इसकी रूहानियत से, रौशन है जग सारा, कितना कदीम, कितना नयीम, सब दुनिया से न्यारा,करती है जरख़ेज़ जिसे, गंगो-जमन की धारा। ऊपर बर्फ़ीला पर्वत, पहरेदार हमारा, नीचे साहिल पर बजता, सागर का नकारा,इसकी खानों से उगल रहा, सोना, हीरा, पारा,इसकी शानो-शौकत का, दुनिया में जयकारा। आया फ़िरंगी दूर से, ऐसा मन्तर मारा,लूटा दोनों हाथ से, प्यारा वतन हमारा। आज शहीदों ने है तुमको, अहले-वतन पुकारा,तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा, हिन्दू, मुसलमां, सिख हमारा भाई-भाई प्यारा, ये है आज़ादी का झण्डा, इसे सलाम हमारा।
