इस्लामी बैंकिंग पर फतावा रजविया में जिक्र, RBI ने भी रखा था प्रस्ताव
बरेली : सूद (ब्याज) इस्लाम में हराम करार दिया गया है। इसी वजह से लंबे समय से मुस्लिम समाज में इस बात को लेकर बहस चलती रही कि बैंकिंग व्यवस्था को किस तरह शरीअत के मुताबिक बनाया जाए। फाजिल-ए- बरेलवी इमाम अहमद रज़ा ख़ां (आला हजरत) ने लगभग 106 साल पहले (1919 में) मुसलमानों की भलाई के लिए लिखे 10 सूत्री कार्यक्रम में शरई बैंकिंग की सलाह दी थी।
आला हजरत की प्रमुख किताब फ़तावा रज़विया में जिक्र
आला हजरत की मशहूर किताब फ़तावा रज़विया (जिल्द 10) में इस्लामी बैंकिंग का जिक्र मिलता है। हालांकि, कुछ साल पहले रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भारत सरकार को बैंकों में “शरई विंडो” खोलने का प्रस्ताव भेजा था। इसका मुस्लिम समाज ने खुशी जताई थी। मगर, इस प्रस्ताव पर अमल नहीं हुआ है।
मुफ्ती-ए-आजम हिंद ने सूद पर दिया फ़तवा
आला हजरत की किताब फ़तावा रज़विया (जिल्द 10) में इमाम अहमद रजा खां ने सूद-मुक्त लेनदेन की वकालत की है। इसके साथ ही मुफ्ती आज़म हिंद हजरत मुस्तफा रज़ा ख़ां ने 1970 में सरकारी बैंकों से लेन-देन पर फतवा दिया। मुफ्ती काज़ी अब्दुर्रहमान बस्तवी ने अपनी किताब “रिसाला बैंक” में इस पर विस्तार से लिखा है। मौलाना अब्दुल्ला ख़ां अजीज़ी ने “सूदी निज़ाम” नामक किताब लिखी, और इस्लामी बैंकिंग का तरीका सुझाया था।
उर्स में भी उठी इस्लामिक बैंक की मांग
आला हजरत के उर्स में भी ब्याज मुक्त लेन-देन को लेकर इस्लामिक बैंक की मांग उठ चुकीं है। यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भी भेजा गया था। इसके साथ ही पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, और पूर्व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री के. रहमान ख़ान से भी ब्याज (सूद) मुक्त लेन देन की मांग को बैंक की मांग की गई थी। बरेली समेत देश के हजारों तकवादार (इस्लाम पर चलने वाले) मुसलमान बैंकों से अपनी रकम पर सूद नहीं लेते हैं, या फिर ब्याज को गरीबों में बांट देते हैं।
